कश्मीर का स्पष्ट संकेत
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कश्मीर का स्पष्ट संकेत
   रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
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कश्मीर का स्पष्ट संकेत
संसदीय उपचुनाव का आभासी बहिष्कार यह दिखाता है कि किस तरह से कश्मीर के लोग भारत सरकार से असंतुष्ट हैं।

रविंद्रनाथ टैगोर भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता थे जिन्हें साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए 1913 में इस पुरस्कार से नवाज़ा गया था।

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कश्मीर का स्पष्ट संकेत
संसदीय उपचुनाव का आभासी बहिष्कार यह दिखाता है कि किस तरह से कश्मीर के लोग भारत सरकार से असंतुष्ट हैं।
नई दि्ल्ली  | संसदीय उपचुनाव का आभासी बहिष्कार यह दिखाता है कि किस तरह से कश्मीर के लोग भारत सरकार से असंतुष्ट हैं।
हमें इस बात को समझना होगा कि कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनावों, विधानसभा चुनावों और संसदीय चुनावों में मतों का प्रतिशत अलग-अलग होता है। सबसे अधिक मत स्थानीय निकाय के चुनावों में पड़ते हैं और सबसे कम संसदीय चुनावों में।

लंबे समय से भारत के लोगों को यह बताया जाता रहा है कि कश्मीर में मत फीसदी का अधिक होना वहां के लोगों के मूड के बारे में बताता है। हम इन आंकड़ों को देखते वक्त इस बात को नजरंदाज कर देते थे कि कितने लोगों ने बहिष्कार किया है।

हमें यह कहा जाता था कि क्रूर ताकतों की सक्रियता के बावजूद कश्मीर के लोग बाहर आते हैं और मत डालते हैं। लेकिन 9 अप्रैल को श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में हुए उपचुनाव में सिर्फ 7.14 फीसदी वोट डाले गए। उस दिन काफी हिंसा भी हुई। इसमें आठ नौजवानों की जान गई और तकरीबन 200 लोग घायल हुए। इससे साफ है कि कश्मीर के लोग भारतीय संवैधानिक संस्थानों से कितने असंतुष्ट हैं।

हमें इस बात को समझना होगा कि कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनावों, विधानसभा चुनावों और संसदीय चुनावों में मतों का प्रतिशत अलग-अलग होता है। सबसे अधिक मत स्थानीय निकाय के चुनावों में पड़ते हैं और सबसे कम संसदीय चुनावों में।

इससे साफ पता चलता है कि संस्थानों की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर कश्मीरियों का कितना विश्वास है। स्थानीय निकाय चुनावों में भारी संख्या में होने वाला मतदान यह दिखाता है कि वहां के लोग रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता देते हैं।

विधानसभा चुनावों में वे इस उम्मीद से वोट देते हैं कि राज्य सरकार उनकी सालों से चली आ रही समस्या का समाधान करेगी। संसदीय चुनावों में होने वाला मतदान अलग है।

कश्मीर के अधिकांश लोगों के लिए भारतीय संसद ने 1993 में प्रासंगिकता खो दी। उस साल भारतीय संसद ने जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा मानने की घोषणा की थी और पाक के कब्जे वाले हिस्से पर भी अपना दावा पेश किया था।

लेकिन संसद ने कश्मीरियों के उत्पीड़न और उनकी लोकतांत्रिक मांगों पर ध्यान नहीं दिया। न तो मौजूदा सरकार ने और न ही पहले की सरकारों ने कश्मीर की राजनीतिक समस्या को बातचीत के जरिए सुलझाने के गंभीर प्रयास किए हैं। स्वायत्तता की मांग के पक्षधर न तो कश्मीर में बहुत हैं और न ही भारत के दूसरे हिस्से में।

सरकार चाहे लाख दावे करे लेकिन 1998 के बाद से संसदीय चुनावों में लगातार कश्मीर के लोगों की दिलचस्पी घटी है। औसतन 70 से 80 फीसदी लोगों ने इन चुनावों का बहिष्कार किया है। 2014 में 74 फीसदी लोगों ने संसदीय चुनावों का बहिष्कार किया था। इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 93 फीसदी पर पहुंच गया है।

इससे साफ पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली नरेंद्र मोदी सरकार में कश्मीर के लोगों का कितना भरोसा है। नरेंद्र मोदी के ‘आतंकवाद या पर्यटन’ के जुमले से कुछ धर्मांध और कट्टर लोग भले ही खुश होते हों लेकिन कश्मीर में इसे पसंद नहीं किया जा रहा है।

भयावह यह भी है कि सरकार कश्मीर की सारी समस्याओं के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने लगी है। सरकार कश्मीर की सारी समस्याओं का समाधान के लिए पर्यटन का झुनझुना वहां के लोगों को थमाने की कोशिश कर रही है।

सरकार की इस सोच पर कई बेहद सक्षम लोगों ने सवाल उठाए हैं। इनमें कैबिनट मंत्री, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और भारतीय सेना के जनरल शामिल हैं। इन लोगों ने चरमपंथ के देसी संस्करण की ओर ध्यान दिलाते हुए राजनीतिक संवाद शुरू करने की जरूरत पर बल दिया। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह कि दिल्ली में बैठी सरकार इनमें से किसी सलाह को मानने को तैयार नहीं दिखती।

नीतियों और विचारों का निर्धारण करने वाले लोग यह मानते हैं कि कश्मीर लोग पाकिस्तान प्रायोजित लड़ाई लड़ रहे हैं और अपने मुस्लिम होने को ढाल बना रहे हैं। लेकिन ऐसी राय रखने वाले लोग यह भूल जा रहे हैं कि भारत सरकार बेहद प्रभावी ढंग से खुद को मुसलमान विरोधी दिखा रही है।

जम्मू चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष राकेश गुप्ता का बयान इसका एक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि रोहिंगिया और बांग्लादेशी मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा जाना चाहिए। यह कोई इकलौती घटना नहीं है। देश के कई हिस्सों में मुस्लिम विरोधी बयानों की कड़ी का एक हिस्सा मात्र है यह बयान।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कश्मीर में सड़कों पर जो युवा उतरे हैं, वे गुस्से में हैं और वे कोई भी बात मानने को तैयार नहीं हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार सिर्फ हथियारों की भाषा ही समझती है। मुठभेड़ की जगहों पर भारी संख्या में लोगों का जमा होना यह दिखाता है कि कश्मीर के लोगों को यह लगने लगा है कि हिंदू बहुसंख्यक नेतृत्व वाले भारत के साथ जुड़कर उनका अस्तित्व सुरक्षित नहीं है।

प्रोपगंडा फैलाने वाले लोगों के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कश्मीर के युवा पैसे लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। सच्चाई यह है कि वे ऐसा इसलिए करने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि अब बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

जम्मू में गौ रक्षकों ने जो किया उससे भी पता चलता है कि लोगों का असंतोष क्यों बढ़ रहा है। यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जत्थे को एक संवेदनशील क्षेत्र में हथियार लहराने की खुली छूट दी गई। सितंबर, 2014 में आई बाढ़ के प्रभावितों के पुनर्वास का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। 8 जुलाई, 2016 को बुरहान वानी को मारे जाने के बाद सामान्य नागरिकों ने काफी हिंसा झेली है।

अब वक्त आ गया है कि भारत के लोग समझें कि कश्मीर समस्या हमारे बीच की है न कि पाकिस्तान की। हम सामूहिक तौर पर इस बात को स्वीकार ने इनकार करते नहीं रह सकते कि भारत और भारतीय सिविल सोसाइटी पर कश्मीर के लोगों का भरोसा घटा है। जिन 93 फीसदी लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया है, वे यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।

(यह टिप्पणी इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली से साभार है।)


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