पत्रकार बीजी वर्गीज
बीजी वर्गीज,प्रधानमंत्री कार्यालय
पत्रकार बीजी वर्गीज
   बुधवार | दिसंबर १३, २०१७ तक के समाचार
पत्रकार बीजी वर्गीज
बीजी वर्गीज का उदाहरण पत्रकारिता के ताजा इतिहास में मील का पत्थर है।
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नई दिल्ली  | सरकार परस्त अखबार में भी एक संपादक सही नेतृत्व दे सकता है, बशर्ते संपादक में रीढ़ हो और संपादक संस्था अक्षुण्ण रहे। तब खबरों की निष्पक्षता और विचारों की बेबाकी को कोई आंच नहीं आएगी। यही बीजी वर्गीज के संपादक काल का सार है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में 17 साल गुजारने के बाद बीजी वर्गीज के जीवन में नया मोड़ आया। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार बने। 25 फरवरी, 1966 को प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना काम-काज संभाला।

राजधानी दिल्ली में अनेक अनुभवी और उम्रदराज पत्रकार हैं। उनमें एक बीजी वर्गीज भी हैं। इस समय सतासिवें साल में चल रहे हैं। हर तरह से सक्रिय हैं। वे हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस के यशस्वी संपादक रहे हैं। कम ही पत्रकार मौलिक लेखक होते हैं।

बीजी वर्गीज कतार तोड़कर अलग खड़े पाए जाते हैं। यानी अपवाद हैं। उनकी नई पहचान कालजयी लेखन से बन रही है। उन्हें जानने और समझने की इसलिए जरूरत है क्योंकि पत्रकारिता की साख पर नए-नए सवाल रोज खड़े हो रहे हैं। बीजी वर्गीज को जानने से संभव है कि उन सवालों का कोई हल भी खोजा जा सके।

हाल में ही उनकी दो किताबें आई हैं। उनमें से एक ‘पोस्ट हेस्ट’ की थोड़ी चर्चा भी मीडिया में हो सकी क्योंकि उसका लोकार्पण डॉ. कर्ण सिंह ने किया। लोकार्पण लीक से हटकर था। हिमाचल प्रदेश से आए डाकिया शेर सिंह ने अपने थैले से पुस्तक निकाली और डॉ. कर्ण सिंह को पकड़ाया। इस तरह पिछले महीने उस पुस्तक का लोकार्पण हुआ। डॉ. कर्ण सिंह के शब्दों में ‘यह पुस्तक भारत की पुनर्खोज है।’ इस कथन में पुस्तक का सार समाया हुआ है।

बीजी वर्गीज की जो दूसरी पुस्तक है वह उनकी जीवनी है। रोचक तो है ही, इसमें वे ढेर सारे तथ्य हैं जिन्हें हर पत्रकार को जानना चाहिए। बीजी वर्गीज कभी-कभार इंडियन एक्सप्रेस में संपादकीय पन्ने पर अभी भी लिखते हैं। वह किसी सरोकार पर उनका नजरिया होता है। वे हस्तक्षेप करने का दंभ नहीं पालते। लेकिन उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यस्तता बहुत है।

उसमें से ही समय निकालकर उन्होंने अपनी जीवनी लिखी है। पुस्तक को नाम दिया है- फर्स्ट ड्राफ्ट, विटनेस टू दी मेकिंग ऑफ माडर्न इंडिया। यह 573 पन्नों की है। पूरा पढ़कर ही इसके नाम की सार्थकता अनुभव में आती है। आजाद भारत के नवनिर्माण की यात्रा के बीजी वर्गीज न केवल साक्षी रहे हैं, बल्कि वे एक पत्रकार के रूप में संदेशवाहक भी रहे हैं। विकास अभिमुख पत्रकारिता के वे पर्याय पुरुष हैं। पाठक को पुस्तक में इसका अनुभव हर पन्ने पर होता जाता है।

उन्होंने करीब चार दशक तक सक्रिय पत्रकारिता की। 22 साल के थे जब वे पत्रकार बने। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें इस सवाल से ज्यादा जूझना नहीं पड़ा कि क्या करना है। उनकी पारिवारिक परंपरा में पत्रकारिता के लिए कोई जगह नहीं थी। वे केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे। उन्हीं दिनों टाइम्स ऑफ इंडिया को दो सहायक संपादकों की जरूरत थी। सर फ्रेसिंस लो संपादक थे। वे लंदन से पढ़े छात्रों में से अपने सहयोगी चुनना चाहते थे। केम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से आग्रह कर कुछ नाम मंगवाए। केम्ब्रिज से जिन तीन छात्रों के नाम दिए गए, उनमें एक बीजी वर्गीज भी थे।

संपादक से बातचीत हुई और वे चुने गए। यह 1948 की बात है। उनसे लंदन के तीन अखबारों में प्रशिक्षु पत्रकार के बतौर काम कराया गया। अगले साल मुंबई टाइम्स ऑफ इंडिया में वे शामिल हुए। उनके सहयोगियों में एन.जे. नानपुरिया, जीजी गोखले, आर.के. लक्ष्मण और डीएस थामस रहे। तब टाइम्स ऑफ इंडिया दिल्ली नहीं आया था। 1951 में बीजी वर्गीज टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली ब्यूरो में विषेष संवाददाता बनाए गए। जहां 1962 तक रहे। वे तब ब्यूरो प्रमुख हो गए थे।

उस समय की दिल्ली छोटी थी और अफसरों की थी। अखबार ने बीजी वर्गीज के लिए तब के कर्जन रोड पर स्थित कांस्टीट्यूशन हाउस में एक कमरा लिया। जहां मशहूर सांसद एच.वी. कामथ उनके पड़ोसी थे। थोड़ी ही दूर पर कास्टीट्यूशन क्लब था। जहां आज एशिया हाउस है। तीस फिरोजशाह रोड पर तब दीवान चंद इनफॉरमेशन सेंटर था। जहां सांसदों के लिए लाइब्रेरी और पढ़ने की जगह बनाई गई थी। वही आजकल दीवान श्री अपार्टमेंट है। जहां सबसे ऊपरी तल पर बीजी वर्गीज रहते हैं। तीन साल पहले उसी तल पर कुछ महीने भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी उनके पड़ोसी थे। नई दिल्ली में ये जगहें तो हैं पर उनका रूपांतरण हो गया है। इसकी जानकारी पुस्तक से मिलती है, लेकिन बिना किसी टिप्पणी के।

टाइम्स ऑफ इंडिया में 17 साल गुजारने के बाद बीजी वर्गीज के जीवन में नया मोड़ आया। वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार बने। 25 फरवरी, 1966 को प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना काम-काज संभाला। सूचना और प्रसारण मंत्री के दिनों में भी इंदिरा गांधी उन्हें बुला चुकी थीं। लेकिन बीजी वर्गीज तब नहीं गए। तीन साल के अनुभव ने उन्हें सरकारी पिंजड़े से निकलने के लिए व्याकुल कर दिया। तभी हिन्दुस्तान टाइम्स का प्रस्ताव उनको मिला।

1969 की पहली जनवरी को वे संपादक बने। उन दिनों की एक मजेदार घटना है। मशहूर कम्युनिस्ट नेता भूपेश गुप्त ने 28 दिसंबर, 1968 को आरोप लगाया कि सरकार बड़े व्यापारिक घरानों से मेलजोल बढ़ा रही है। सबूत दिया कि बीजी वर्गीज प्रधानमंत्री कार्यालय से हिन्दुस्तान टाइम्स जा रहे हैं। उनके पास सरकार की तमाम गोपनीय सूचनाएं हैं। कुछ महीने बाद भाजपा के सांसद कंवर लाल गुप्त ने तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल से सवाल पूछा कि क्या बीजी वर्गीज को संपादक इसलिए बनाया गया है कि के.के. बिड़ला के खिलाफ कोई जांच नहीं होगी?

राजनीति का यह ढर्रा पुराना है। आजकल भी नेताओं के बयान में ऐसे बेतुके अरोप मिलते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स बेषक सरकार परस्त रहा है और आज भी है। यह मायने नहीं रखता कि सरकार किस पार्टी की है। बीजी वर्गीज का उदाहरण पत्रकारिता के ताजा इतिहास में मील का पत्थर है। सरकार परस्त अखबार में भी एक संपादक सही नेतृत्व दे सकता है, बषर्ते संपादक में रीढ़ हो और संपादक संस्था अक्षुण्ण रहे। तब खबरों की निष्पक्षता और विचारों की बेबाकी को कोई आंच नहीं आएगी। यही बीजी वर्गीज के संपादक काल का सार है।

उन्होंने संजय गांधी के मारूति घोटाले पर मिट्टी नहीं डाली। अपने संवाददाताओं को खबर देने की आजादी दी। जयप्रकाष नारायण के नेतृत्व में बिहार आंदोलन छिड़ने के कुछ ही दिनों बाद बीजी वर्गीज ने दो लेख लिखे। पहला लेख 24 मार्च, 1974 का है। उसका शीर्षक है- ‘ए काल फॉर एक्षन।’ लेख के आखिरी दो वाक्य मानों भविष्यवाणी साबित हुए। वे हैं- ‘यह उनके (इंदिरा गांधी) लिए आखिरी मौका है। नहीं तो 6 या 8 महीने बाद बहुत देर हो जाएगी।’ दूसरा लेख एक हफ्ते बाद ही लिखा। उन लेखों का विस्फोटक प्रभाव पड़ा। इंदिरा गांधी की सत्ता की चूलें हिल गई। उसके बाद जो कुछ हुआ वह ऐसी कहानी है जिसे बार-बार याद किया जाना चाहिए, क्योंकि वह पत्रकारिता के संघर्ष की गाथा है।

उन लेखों से के.के. बिड़ला पर बीजी वर्गीज को हटाने का दबाव बढ़ा। उन्होंने षिकायतों से शुरुआत की। वे खबरों से संबंधित थीं। संपादक बीजी वर्गीज ने खबरों को सही बताया और अपने संवाददाताओं के काम को सराहा। के.के. बिड़ला कोई रामनाथ गोयनका नहीं हो सकते थे, जो सरकार को सीधा जवाब देकर अपने संपादक के साथ खड़े होने के लिए जाने जाते थे। इंदिरा गांधी की सरकार के दबाव में बीजी वर्गीज को नोटिस थमा दी गई। अखबार तब फल-फूल रहा था। बीजी वर्गीज उसके विस्तार की योजनाओं पर काम कर रहे थे।

नोटिस के जवाब में बीजी वर्गीज ने के.के. बिड़ला को पत्र लिखा। उनमें पत्र व्यवहार का वह सिलसिला सालभर चलता रहा। वे पत्र अपने आप में संपादक की परिभाषा बन गए हैं। उन्हीं पत्रों के आधार पर डी.आर. मनकेकर और हिन्दुस्तान टाइम्स के सहायक संपादक सी.पी. रामचंद्रन ने प्रेस परिषद में अखबार के पाठकों और पत्रकारों की ओर से षिकायत दर्ज कराई। प्रेस परिषद ने प्रबंधन पर रोक लगा दी। प्रेस परिषद ने सुनवाई की। तब प्रेस परिषद का दफ्तर वही दस जनपथ होता था, जहां इन दिनों सोनिया गांधी रहती हैं। मामला प्रेस परिषद और हाईकोर्ट में गया। वहां प्रेस की स्वाधीनता विचार का मुख्य विषय था, जिसे सेमिनार पत्रिका ने अपने एक अंक में विस्तार से छापा। वह अंक दिसंबर 1975 का है। याद रखें कि इमरजेंसी के वे दिन थे। अपनी यादों के झरोखे से यह भी देख लें कि तब जहां के.के. बिड़ला और उन जैसे तमाम उद्योगपति इमरजेंसी का स्वागत कर रहे थे, वहीं प्रेस यानी नागरिक की आजादी के लिए बीजी वर्गीज और कुछ पत्रकार संघर्ष कर रहे थे। हाईकोर्ट में मुकदमा हारने के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रबंधन ने बीजी वर्गीज को बर्खास्त कर दिया। तारीख थी- 23 सितंबर, 1975।

अभी क्या कर रहे हैं

1975 में बीजी वर्गीज को पत्रकारिता के लिए मैग्सेसे अवार्ड मिला। उनकी चर्चित पुस्तकें हैं- वाटर्स ऑफ होप, इंडियाज नार्थ-इस्ट रिसर्जेंट, वैरियर ऑफ दी फोर्थ इस्टेट (रामनाथ गोयनका), रेज, री कांसिलिएषन, सिक्योरिटीः मैंनेजिंग इंडियाज डायवरसिटीज। इन दिनों वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। कामनवेल्थ की मानवाध्ािकार संस्था के अध्यक्ष हैं।

जिसने अखबार का इतिहास लिखवाया

हिन्दुस्तान टाइम्स अकाली अखबार था। उसे लाला लाजपत राय ने स्वाधीनता आंदोलन का अखबार बनाया। घनश्याम दास बिड़ला ने पैसा लगाया था। कुछ सालों बाद जब देवदास गांधी संपादक बने तो अखबार दिल्ली आया। कनाट प्लेस में उसका दफ्तर था। जब बीजी वर्गीज को हटाया गया तब वे अखबार के पचास साल का इतिहास लिखवा रहे थे।

(यह लेख यथावत से साभार है)


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