भारतीय गुरु परंपरा में गोपीचंद
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भारतीय गुरु परंपरा में गोपीचंद
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भारतीय गुरु परंपरा में गोपीचंद
पुलेला गोपीचंद को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि भारतीय गुरु परंपरा में उनका गहरा विश्वास है। पिछले दिनों जिन लोगों ने उनके बयान को ध्यान से पढ़ा और सुना है वे भी यही मानते हैं।
नई दिल्ली  | पुलेला गोपीचंद को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि भारतीय गुरु परंपरा में उनका गहरा विश्वास है। पिछले दिनों जिन लोगों ने उनके बयान को ध्यान से पढ़ा और सुना है वे भी यही मानते हैं।
पुलेला गोपीचंद अपने गुरुकुल से कई धुरंधर खिलाड़ियों को निकाल चुके हैं, जिसने देश का नाम ऊंचा किया है। गोपी दिन-रात एकेडमी और खिलाड़ियों के बारे में सोचते-विचारते रहते हैं। वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि चैंपियंस बनाना कोई पार्ट-टाइम बिजनेस नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर तक खुद को पहुंचने के लिए कुछ चीजें लगातार करनी होती हैं।

संदर्भ जान लेने से बात स्पष्ट हो जाती है। दरअसल, भारत लौटने पर ओलंपिक रजत पदक विजेता पीवी सिंधु से कुछेक पत्रकारों ने अटपटे सवाल किए। वह सवाल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच सिंधु पर हक जताने से जुड़ा था।

गोपीचंद उन पत्रकारों की चतुराई को भांप गए और गुरु परंपरा का निर्वाह करते हुए सवालों का जवाब देने खुद आगे आ गए। वे बोले, “मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि सिंधु भारत की बेटी है। वह भारतीय है।” यह जवाब उन पत्रकारों के सवाल पर भारी पड़ा, जो विवाद चाहते थे। इस तरह बैडमिंटन कोर्ट से बाहर भी गोपीचंद ने शिष्य का पूरा ध्यान रखा। यह तत्व भारतीय गुरु परंपरा में ही दिखलाई देता है।

रियो ओलंपिक में पीवी सिंधु की सफलता के पीछे कोच पुलेला गोपीचंद की तपस्या को भी हर कोई याद कर रहा है। वे 42 साल के हैं। पिछले 13 साल से प्रशिक्षण को बतौर करियर अपना लिया है। हैदराबाद के आईटी कॉरीडोर में स्थित अपने एकेडमी में गोपीचंद अहलेसुबह पहुंच जाते हैं।

जब तक एकेडमी में सूर्य की किरणें फैलती हैं, तब तक वे दिन का पहला सत्र पूरा कर चुके होते हैं। उनका पहला काम पीवी सिंधु और किदांबी जैसे खिलाड़ियों की प्रशिक्षित करना होता है। सुबह-सबेरे यहां पहुंचकर कोई भी उन्हें अपने शिष्यों को खेल के नए-नए नुस्खे सिखाते देख सकता है।

एकेडमी में बैडमिंटन व शटल की आवाज के अतिरिक्त वहां कोई दूसरी आवाज गूंजती है तो वह पुलेला गोपीचंद की। यह दावा किया गया है कि गोपीचंद ने सिंधु के चॉकलेट, बिरयानी और प्रसाद खाने पर रोक लगा दी थी। इसका अर्थ यह है कि एक गुरु के तौर पर वे सख्त भी हैं और सह्रदयी भी।

बतौर कोच करियर वे अपने गुरुकुल से कई ऐसे धुरंधर खिलाड़ियों को निकाल चुके हैं, जिसने देश का नाम ऊंचा किया है। गोपी दिन-रात एकेडमी और खिलाड़ियों के बारे में सोचते-विचारते रहते हैं। वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि चैंपियंस बनाना कोई पार्ट-टाइम बिजनेस नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर तक खुद को पहुंचने के लिए कुछ चीजें लगातार करनी होती हैं।

आज गोपी के एकेडमी की चर्चा हर तरफ है, लेकिन यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपने घर को गिरवी रखकर उन्होंने एकेडमी खोलने के लिए पैसे जुटाए। मदद करने का जिन लोगों ने वादा किया था, वे पीछे हट गए। तब उनके एक कारोबारी मित्र ने उनकी सहायता की। शर्त यह थी कि ओलंपिक खेल में भारत के लिए पदक जीतना है। गोपी ने अपना वादा 2012 लंदन ओलंपिक में ही पूरा कर दिया था।

रियो ओलंपिक (2016) में वे एक कदम आगे बढ़ चुके हैं। गोपीचंद की पहचान एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में भी रही है, जिसने केवल इस वजह से एक विज्ञापन करने से मना कर दिया था कि शीतल पेय में हानिकारक पदार्थ होते हैं।

गोपी ने 2001 में ऑल इंग्लैंड चैंपियन जीतकर बैडमिंटन की दुनिया में अपना नाम शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल कर लिया था। इस चैंपियनशिप को जीतने वाले वे प्रकाश पादुकोण के बाद दूसरे भारतीय खिलाड़ी बने।

गोपीचंद ने आंध्र प्रदेश सरकार की मदद से अपनी बैडमिंटन एकेडमी के लिए साल 2003 में ज़मीन ली थी। उनकी एकेडमी में आठ कोर्ट, एक स्वीमिंग पूल, वेट ट्रेनिंग रूम, कैफेटेरिया और आराम करने की जगह है। गोपी की एकेडमी से पी कश्यप, पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, गुरुसाई दत्त और अरुण विष्णु जैसे सफल खिलाड़ी निकले हैं।

2009 में पुलेला गोपीचंद द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजे गए। 2014 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया हैं।


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