पीओके की कहानी
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पीओके की कहानी
कश्मीर मसले पर भारत का रुख पहले से सख्त हो गया है। यह अचानक नहीं हुआ है। गौर से देखें तो मई 2015 से इसकी पृष्ठभूमि बनने लगी थी।
नई दिल्ली  | कश्मीर मसले पर भारत का रुख पहले से सख्त हो गया है। यह अचानक नहीं हुआ है। गौर से देखें तो मई 2015 से इसकी पृष्ठभूमि बनने लगी थी।
रणनीतिकारों की दूरदर्शिता की कमी के कारण पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर को लेकर अपने प्रोपेगैंडा में सफलतापूर्वक गतिमान है। पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर भारत को मजबूती से दावा करना चाहिए। - प्रियंका सिंह (सुरक्षा मामले की जानकार)

22 मई, 2015 को भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा था कि भारत के पास अफगानिस्तान से जुड़ी 106 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है। दरअसल, वे जिस हिस्से का जिक्र कर रहे थे, वह पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के इन क्षेत्रों का जिक्र करने के बाद यह मुद्दा बहस के केंद्र में है।

स्मरण रहे संसद के दोनों सदनों ने 22 फरवरी,1994 को ध्वनिमत से एक प्रस्ताव पारित किया गया था। उस प्रस्ताव में भारत ने पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) पर अपना सीधा हक जताते हुए कहा था- “यह भारत का अटूट अंग है। पाकिस्तान को उस भाग को छोड़ना होगा, जिस पर उसने कब्जा जमाया हुआ है।”

इस प्रस्ताव को संसद ने ध्वनिमत से पारित किया था। लेकिन, क्या प्रस्ताव पारित करना काफी था? इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आईडीएसए) की शोधार्थी प्रियंका सिंह मानती हैं कि पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी पूर्व स्थिति बहाल करने के लिए भारत में राजनीतिक, कूटनीतिक और जनता के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए सरकार के स्तर पर कोई प्रभावी पहल नहीं हुई है।

आईडीएसए की वेबसाइट पर प्रकाशित अपने एक लेख में प्रियंका ने लिखा है, “एक सामान्य धारणा यह बनी है कि भारत उस भाग (पीओके) को खो चुका हैऔर उसने नियंत्रण रेखा (एलओसी) को ही सीमा रेखा स्वीकार कर लिया है।

यह कोई नहीं जानता है कि फऱवरी 1994 के बाद भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के भारत में विलय की दिशा में क्या-क्या कदम उठाए हैं। संसद का प्रस्ताव है कि पीओके का भारत में विलय करना है। लेकिन, यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि विलय कब होगा?

इस विलय के संदर्भ में भारत की गंभीरता पर सवाल इसलिए भी उठते हैं कि जरूरत के समय कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर इसने संजीदगी नहीं दिखाई। इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। मई 2014 में पाकिस्तान की संसद ने एक बिल पास किया था, जिसका नाम है- ‘सर्वेइंग एंड मैपिंग एक्ट।’ इसका उद्देश्य पाकिस्तान का भौगोलिक क्षेत्र निर्धारण कर एक नक्शा तैयार करना था।

इस नक्शे में अक्साई चिन को नहीं दर्शाने की बात हुई थी, जबकि वह जम्मू और कश्मीर का ही भाग है। प्रियंका बताती हैं कि ऐसी कोई खबर नहीं है कि भारत ने पाकिस्तान के इस नक्शे या ‘सर्वेइंग एंड मैपिंग एक्ट पर कोई आपत्ति दर्ज की है। फरवरी 2015 में इसी कानून के तहत पाकिस्तान सरकार ने सर्वेक्षण कर एक नियम बनाया है जो मार्च 2015 में पाकिस्तानी गजट में प्रकाशित भी हो चुका है।

1994 के बाद एक बार फिर भारतीय संसद कश्मीर को लेकर गंभीर है। संसद में ‘जियो स्पेशल इन्फोर्मेशन रेगुलेशन बिल 2016' प्रस्तावित है। भारत के प्रस्तावित इस मैप बिल में कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताने से पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में गुहार लगाकर इसे यूएन के प्रस्ताव का उल्लंघन बताया है|

मई 2016 में पाकिस्तान ने मसौदा बिल में कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ से हस्तक्षेप की मांग की थी। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून को एक पत्र लिखकर भारत के ‘जियो स्पेशल इन्फार्मेशन रेगुलेशन बिल 2016’ का उल्लेख करते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की।

पत्र में लोधी ने लिखा है कि भारत जम्मू–कश्मीर के विवादास्पद हिस्से को अपने नक्शे में दिखा रहा है, जो तथ्यात्मक रूप से गलत है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय और यूएन ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन यह घटना जम्मू और कश्मीर मसले पर पाकिस्तान की अति सक्रियता दिखाती है।

प्रियंका बताती है, “अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर दावे के बावजूद पाकिस्तान कश्मीर भावना को उभारने में सफल होता रहा है। वह कश्मीर के मसले को जिंदा रखना चाहता है। उसे उभारता रहता है। वह लगातार जम्मू और कश्मीर को लेकर सक्रिय है, जबकि भारत पीओके को लेकर उदासीन ही है।” वे यह मानती हैं कि भौगोलिक विधान के परिप्रेक्ष्य में भारत को अपना दावा पीओके पर करना होगा। केवल मानचित्र बनाने से बात नहीं बनेगी।

प्रियंका मानती हैं कि रणनीतिकारों की दूरदर्शिता की कमी के कारण पाकिस्तान जम्मू और कश्मीर को लेकर अपने प्रोपेगैंडा में सफलतापूर्वक गतिमान है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर भारत को मजबूती से दावा करना चाहिए। यह रणनीति जेके पर पाकिस्तान के दावे को कमजोर करेगी। इसके साथ-साथ पाक-चीन के आर्थिक नीति को भी प्रभावित करेगी।

स्मरण रहे कि पीओके जिसे कश्मीर कहा जाता है, दरअसल वह जम्मू का हिस्सा रहा है। जानकार बताते हैं कि वहां की जुबान कश्मीरी नही है, बल्कि डोगरी और मीरपुरी का मिश्रण है। मीरपुर-मुजफ्फराबाद क्षेत्र 13,300 वर्ग किलोमीटर का इलाका है। यह पट्टी 400 किलोमीटर लंबी है और इसकी चौड़ाई 16 से 64 किलोमीटर है।

अगर इतिहास में जाएं तो पीओके पर भारत का पक्ष साफ हो जाएगा। देश के विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर राज्य के भारत में विलय के प्रस्ताव को स्वीकार किया था। भारत का दावा है कि महाराजा हरि सिंह से हुई संधि के परिणामस्वरूप पूरे कश्मीर राज्य पर भारत का अधिकार बनता है। इस कारण भारत का दावा पूरे कश्मीर पर सही है।

इसके बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि बीते 22 सालों में संसद में पीओके को लेकर पारित प्रस्ताव का क्या हुआ? इससे जो जानकारी मिलती है, उससे निराशा ही हाथ आती है। इस दौरान केंद्र में कांग्रेस, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकारें रहीं। किसी सरकार ने देश की जनता को यह बताने की कोशिश नहीं की कि पीओके पर संसद के प्रस्ताव का क्या हुआ?

सामरिक रणनीतिकार मानते हैं कि वक्त की मांग यह है कि भारत सरकार कूटनीतिक पहल तेज करे। वह पीओके को लेकर वैधानिक कदम भी उठाय। इसकी शुरुआत एक स्वेत-पत्र को जारी कर होनी चाहिए। कश्मीर घाटी में पीओके को लेकर जागरूकता बढ़ानी चाहिए।

आज बलूचिस्तान के बारे में भारत की जनता कहीं अधिक जानती है, जबकि पीओके के मुजफ्फराबाद में क्या हो रहा है? इसकी जानकारी लोगों को कम है। 2010 में सरकार एक अध्ययन के तहत इस निष्कर्ष तक पहुंची थी कि कश्मीरी युवक पीओके की सरकार और राजनीतिक स्थिति से अनजान हैं। यहां आजाद कश्मीर शब्द लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। उसे जानकारी और सूचना के माध्यम से एक रणनीति के तहत खत्म करना होगा। पिछली सरकारों ने जो गलतियां की हैं, उसे मोदी सरकार नहीं दोहरान चाहिए।

जम्मू और कश्मीर की भौगोलिक स्थिति क्या है? आज भारत के जनमानस में यह चित्र अंकित नहीं है। इसकी जानकारी को लेकर भी कोई जागरूकता नहीं है। इस धारणा को बदलने की जरूरत है। स्मरण रहे कि ब्रिटिश शासन के तहत आने वाले जम्मू और कश्मीर के पूरे भू-भाग को भारत अपना हिस्सा मानता है। इसमें पाक अधिकृत कश्मीर के साथ गिलगित बाल्टिस्तान तो है ही। इसमें अक्साई चिन और काराकोरम दर्रा भी शामिल है।


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