याद आते रहेंगे प्रेमचंद
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याद आते रहेंगे प्रेमचंद
प्रेमचंद इस अर्थ में निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं कि उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की सदारत की थी।उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार बना।
नई दिल्ली  | प्रेमचंद इस अर्थ में निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं कि उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की सदारत की थी।उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार बना।
प्रेमचंद ने सन् 1930 के आस-पास ऐलानिया तौर पर कहा था कि जो कुछ लिख रहे हैं, वह स्वराज के लिए लिख रहे हैं। उपनिवेशवादी शासन से भारत को मुक्त करने के लिए। और दूसरा उन्होंने यह भी लिखा है कि केवल जॉन की जगह गोविंद को बैठा देना ही स्वराज्य नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वाधीनता भी होना चाहिए।- नामवर सिंह, प्रसिद्ध समालोचक

लेकिन स्वयं प्रेमचंद प्रगतिशीलता की परिभाषा करते हैं, उस दृष्टि से देखा जाए तो हिंदी साहित्य का जब से आरंभ हुआ है, बड़े रचनाकारों में कबीर अपने दौर में वही भूमिका अदा कर रहे थे जिसका विकास लगभग पांच सौ वर्ष बाद प्रेमचंद ने किया।

प्रेमचंद एक लंबी परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन उन्होंने 20वीं शताब्दी की भाषा में उसका विकास भी किया, इसलिए उन्हें पहला प्रगतिशील कथाकार कहें तो कोई आपत्ति नहीं है।

प्रेमचंद ने सन् 1930 के आस-पास ऐलानिया तौर पर कहा था कि जो कुछ लिख रहे हैं, वह स्वराज के लिए लिख रहे हैं। उपनिवेशवादी शासन से भारत को मुक्त करने के लिए। और दूसरा उन्होंने यह भी लिखा है कि केवल जॉन की जगह गोविंद को बैठा देना ही स्वराज्य नहीं है, बल्कि सामाजिक स्वाधीनता भी होना चाहिए।

सामाजिक स्वाधीनता से उनका तात्पर्य सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से भी था। तो इस अर्थ में वे स्वाधीनता की परिभाषा करते थे और इसलिए उनकी प्रगतिशीलता का जो आधार था उसे बहुत बुनियादी क्राँतिकारी कहना चाहिए।

गांधी से आगे

उनकी रचनाओं पर नज़र डालें तो उसमें ज़मींदार के ख़िलाफ़ ग़रीब किसानों की लड़ाई है। जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ और दबे कुचले लोगों की लड़ाई है।

यद्यपि लोग उन्हें गांधीवादी कहते थे, लेकिन वे गांधी जी से दो कदम आगे बढ़कर आंदोलन और क्रांति की बात करते हैं।प्रेमचंद अपने ज़माने के साहित्यकारों से ज़्यादा बुनियादी परिवर्तन की बात करते हैं।

लंदन में पढ़कर सज्जाद ज़हीर जैसे लोग जब यहां आए और उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का प्रस्ताव रखा तो उनकी नज़र सबसे पहले प्रेमचंद पर गई और उन्होंने बड़े संकोच के साथ स्वीकार किया कि उनसे भी बड़े लोग हो सकते हैं, लेकिन कोई बात नहीं मैं तैयार हूं।

इससे लगता है कि वे इंतज़ार कर रहे थे कि नई पीढ़ी के लेखक आएं। लंदन कांग्रेस से जो लोग आए थे वे तो फ़ासिज़्म, बरबर्ता के ख़िलाफ़ सभ्यता को बचाने वाला आंदोलन था, लेकिन उस आंदोलन ने भारत में आकर एक नई शक्ल ले ली और वह पूंजीवादी देशों में पिछड़े हुए समाज के संघर्ष की कहानी बन बैठी।

महासागर

वैसे प्रगतिशील लेखकों के उस सम्मेलन में जैनेंद्र कुमार भी गए थे, लेकिन प्रेमचंद के शिष्य और प्रिय होते हुए भी उनकी दुनिया दूसरी थी। उन्होंने नारी की मुक्ति का पक्ष लिया और बाकी पक्षों पर उनकी रचनाओं पर जोर दिखाई नहीं पड़ता।

यशपाल यद्यपि क्रांतिकारी भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद की क्रांति के पृष्ठभूमि से आए थे, तो भी वे प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। आगे चलकर नागार्जुन आते हैं और वे प्रेमचंद के किसानों की लड़ाई वाला पहलू लेते हैं।

यद्यपि फणीश्वरनाथ रेणु समाजवादी विचारधारा वाले थे, लेकिन उनका मैला आंचल, प्रेमचंद के गोदान के बाद का सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है।

प्रेमचंद की लड़ाई का मतलब था धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई, सेक्यूलरिज़्म की लड़ाई। आज़ादी की लड़ाई से पहले सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि कुछ और थी। बंटवारे के बाद राही मासूम रजा ने आधा गांव लिखा तो शानी ने काला पानी लिखा।

प्रेमचंद का एक विषय बहुत महत्वपूर्ण था सांप्रदायिक सद्भाव। चाहे मुस्लिम कट्टरतावाद हो या हिंदू सांप्रदायिकतावाद। अमृतलाल नागर ने भी बूंद और समुद्र लिखा है जो लखनऊ के आधार पर एक सांप्रदायिक सद्भाव दिखता है।

प्रेमचंद तो महासागर थे, उतनी व्यापक भूमि तो एक किसी लेखक के पास नहीं है, लेकिन उसके हिस्से को लेकर प्रगतिशीलता की लड़ाई में आगे बढ़ने वाले लोग हिंदी और ऊर्दू दोनों में हैं।

(नामवर सिंह से विनोद वर्मा की बातचीत पर आधारित यह लेख बीबीसी डॉट कॉम से साभार है। हालांकि बातचीत पुरानी है, लेकिन प्रासंगिकता बनी हुई है।)


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