मन में अनुपम
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मन में अनुपम
दिल्ली के निगमबोध घाट पर अनुपन मिश्र को विदा कर लोग-बाग लौटे तो वे खाली न थे। मन भारी था। अनुपम मिश्र की स्मृति उभर आई थी।
नई दि्ल्ली  | दिल्ली के निगमबोध घाट पर अनुपन मिश्र को विदा कर लोग-बाग लौटे तो वे खाली न थे। मन भारी था। अनुपम मिश्र की स्मृति उभर आई थी।
जो मिला वह भी, जो उन्हें पढ़ा वह भी अनुपम मिश्र का होकर रह गया। एक समय प्रभाष जोशी ने उनके बारे में सटीक टिप्पणी की थी- हमारे समय का अनुपम आदमी।

जो मिला वह भी, जो उन्हें पढ़ा वह भी अनुपम मिश्र का होकर रह गया। वे पत्रकार थे।पर्यावरणविद् थे। जल संरक्षण थे। आचरण और स्वभाव से गांधीवादी थे। कम लोग जानते होंगे कि वे बेहतरीन फोटोग्राफर भी थे।

अनुपम मिश्र बीते एक बरस से प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे थे। वे 68 के थे। दिल्ली के एम्स में उनका इलाज चल रहा था, तभी सोमवार को अहलेसुबह खबर आई कि उनका निधन हो गया।

वे समाज और राजनीति के बदलते स्वरूप को खूब समझते थे। हालांकि, इस पर बोलते कम थे। इक बार कहा था- देश में राजनीति और पानी दोनों का स्तर नीचे आ गया है।

खैर, विकास की तरफ बेतहाशा दौड़ते समाज को कुदरत की कीमत समझाने वाले अनुपम ने देश भर के गांवों का दौरा कर रेन वाटर हारवेस्टिंग के गुर सिखाए।'आज भी खरे हैं तालाब', 'राजस्थान की रजत बूंदें' जैसी उनकी लिखी किताबें जल संरक्षण की दुनिया में मील के पत्थर की तरह हैं।

अनुपम मिश्र की मृत्यु पर लोगों ने अपने-अपने शब्दों में श्रद्धांजलि दी है। वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने फेसबुक पर लिखा, "स्मार्टफोन और इंटरनेट के इस दौर में वे चिट्ठी-पत्री और पुराने टेलीफोन के आदमी थे। लेकिन वे ठहरे या पीछे छूटे हुए नहीं थे। वे बड़ी तेज़ी से हो रहे बदलावों के भीतर जमे ठहरावों को हमसे बेहतर जानते थे।"

कुमार गंधर्व की बेटी कलापीनी कोमकली ने फ़ेसबुक पर लिखा है, "सही अर्थों में भारतीय परिवेश, प्रकृति को गहराई तक समझने वाले अद्भुत विचारक,पर्यावरणविद, निश्चित ही अपनी तरह के विरले कर्मयोगी।"

वहीं वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने फेसबुक पर लिखा है, "हमारे समय का अनुपम आदमी। ये शब्द प्रभाष जोशीजी ने कभी अनुपम मिश्र के लिए लिखे थे। सच्चे, सरल, सादे, विनम्र, हंसमुख, कोर-कोर मानवीय। इस ज़माने में भी बग़ैर मोबाइल, बग़ैर टीवी, बग़ैर वाहन वाले नागरिक। दो जोड़ी कुर्ते-पायजामे और झोले वाले इंसान। गांधी मार्ग के पथिक। 'गांधी मार्ग' के सम्पादक। पर्यावरण के चिंतक। 'राजस्थान की रजत बूँदें' और 'आज भी खरे हैं तालाब' जैसी बेजोड़ कृतियों के लेखक।"

पत्रकार सचिन कुमार जैन ने फ़ेसबुक पर लिखा है, "पानी और पर्यावरण की एक अलग ही समझ विकसित करने वाले और भाषा के समाज से रिश्तों को सामने लाने वाले बहुत सहृदय और स्पष्ट व्यक्ति आदरणीय अनुपम मिश्र जी हमारे बीच नहीं रहे।"


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