कलम का सिपाही
देवदत्त,पत्रकार,प्वाइंट ऑफ व्यू
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कलम का सिपाही
विरोध का स्वर "प्वाइंट ऑफ व्यू" में जरूर था, लेकिन इसके पीछे कोई झंडेबाजी नहीं थी। बहुत कुरेदने पर देवदत्त बोले।
नई दिल्ली  | देवदत्त 90 साल के हैं। एक जमाने में दिल्ली से ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ नाम की पत्रिका निकालते थे, जिसकी सामाजिक और राजनीतिक हल्कों में खूब चर्चा होती थी।
पत्रकारिता में आदर्श जैसी कोई चीज नहीं होती है। जिसे हम आदर्श कहते हैं, दरअसल वही हमारा काम है। - देवदत्त, वरिष्ठ पत्रकार

एक बार दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में देवदत्त से मिलते ही जयप्रकाश नारायण ने कहा था, ‘देवदत्त, इतना तेज क्यों लिखते हो?’ दूसरा किस्सा भी है। उससे भी देवदत्त की पत्रकारिता को समझने में मदद मिलती है। वे हमेशा सीधे और स्पष्ट सवाल करते हैं। एक बार आचार्य विनोबा से किया, तो उन्हें देवदत्त का सवाल पसंद नहीं आया। बोले ‘तुम बेवकूफ हो।’ इस पर देवदत्त ने कहा, ‘सो तो ठीक है, लेकिन बेवकूफ सवाल तो पूछ सकता है।’ इससे विनोबा प्रभावित हुए। फिर कमरे में बुलाकर उनसे बातचीत की। ऐसे हैं, देवदत्त।

वे मानते हैं कि पत्रकारिता में आदर्श जैसी कोई चीज नहीं होती है। जिसे हम आदर्श कहते हैं, दरअसल वही हमारा काम है। यह विचार वे गोष्ठियों और संवाद प्रक्रियाओं में व्यक्त करते रहे हैं और खुद भी इसी लीक पर चलते रहे हैं।

महात्मा गांधी के सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगों का देवदत्त ने गहरा अध्ययन किया है। गांधी से वे गहरे प्रभावित हैं। उनकी बातों को नए-नए संदर्भों में जांचते-परखते रहते हैं। गांधी ने जिस राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था की बात की थी, उसकी संभावना को भी टटोलते रहते हैं।

यही वजह है कि उनकी लेखनी हमेशा वैकल्पिक व्यवस्था की खोज करती हुई मालूम पड़ती है। उनका मानना है कि वर्तमान व्यवस्था, एक पूंजीवादी व्यवस्था पर टिकी है। इसके पीछे की ताकत वैज्ञानिक तकनीक है। जब तक इस तकनीक के विकल्प को नहीं ढूंढ़ लिया जाता है, तब तक वैकल्पिक व्यवस्था की बात करना बेइमानी ही होगी।

वे बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प को तलाशने की दो कोशिशें हुई हैं। एक कोशिश स्वयं गांधी ने की थी। उन्होंने सेवाग्राम का प्रयोग किया, जबकि वहीं दूसरी कोशिश विनोबा ने भूदान के रूप में की थी। दुर्भाग्य से दोनों ही प्रयोग समाज में सफल नहीं हुए।

बहरहाल, नई संभावनाओं के मद्देनजर विचारों को साझा करने के लिए देवदत्त ने ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ निकाला था। हालांकि वे कहते हैं, “आप यह न समझें कि पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ मैंने कोई जिहाद शुरू किया था। मेरे लिए ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ केवल अपनी बात कहने का जरिया था। यह उस नागरिक की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, जो इस पूंजीवादी व्यवस्था की खामियों को जानता है।”

वैसे भी समाज को जाने-समझे बगैर पत्रकारिता संभव नहीं है। भारतीय समाज को गहराई से समझने के लिए देवदत्त ने लंबी साधना की है। वे स्वयं भी मानते हैं कि भारत के समाज को समझने के लिए हमें पक्की सड़क को पार कर पगडंडियों पर चलने की जरूरत है, क्योंकि वहीं असल भारत है।

हालांकि, हिंदुस्तान बंटवारे के समय देवदत्त लाहौर में थे। वे लाहौर विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे। स्थिति की गंभीरता का उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था और वे लाहौर में ही रहना चाहते थे। उनके लिए दिल्ली और लाहौर में कोई फर्क नहीं था, लेकिन हिंसा फैली तो उन्हें 17 अगस्त, 1947 को दिल्ली के लिए रवाना होना पड़ा।

तब दिल्ली की आबो-हवा में जहर घुला हुआ था। शहर और शहर के बाहर भी रिफ्यूजियों के लिए तंबू लगे थे। सरकार उनकी व्यवस्था में जुटी थी। उन्हें सुविधाएं मुहैया करा रही थी। देवदत्त चाहते तो उन सुविधाओं का उपभोग कर सकते थे, लेकिन उन्हें इन चीजों से कोई मतलब नहीं था। इनकी दुनिया अलग थी। वे उस सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की हवा को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, जो उन दिनों तेजी से बह रही थी। इस कोशिश में वे पैदल ही दिल्ली नाप लिया करते थे।

गांधी को सुनना उन्हें पसंद था। वे उनकी प्रार्थना में अक्सर शामिल हुआ करते थे। तब वे करीब 25 साल के थे। ज्ञात लोगों में देवदत्त एक मात्र पत्रकार हैं, जिन्होंने गांधी को गोली लगते देखा था। 30 जनवरी, 1948 की शाम बिड़ला भवन में जो कुछ हुआ था, उसे उन्होंने अपनी डायरी में लिख रखा है। लेकिन कभी इसकी सार्वजनिक चर्चा नहीं की। हालांकि, तब वे पत्रकार नहीं थे, लेकिन जब पत्रकारिता की दुनिया में आए, तब भी इसकी चर्चा नहीं की। न कुछ लिखा, न बोला।

पत्रकारिता की दुनिया में छोटी-छोटी घटना का गवाह होने और उसे बताने को पत्रकार लालायित रहते हैं। देवदत्त उनसे बिल्कुल अलग हैं। कम लोग जानते हैं कि जब गांधीजी को गोली लगी थी तो वे उनसे मात्र दो-तीन मीटर की दूरी पर खड़े थे। पहली बार यह बात तब सामने आई, जब गांधीजी की शहादत के पचास साल पूरे होने पर 1998 में ‘जनसत्ता’ अखबार ने इस बाबत पहले पन्ने पर खबर छापी।  

देवदत्त हिन्दुस्तान की आजादी को एक राजनीतिक फैसला मानते हैं। वे कहते हैं कि “हम जिस संविधान और व्यवस्थागत ढांचे पर खड़े हैं, वह गांधी की कल्पना का मॉडल नहीं है, बल्कि पाश्चात्य मॉडल है। यदि हम पंचायती राज की कल्पना करते तो वह भारतीय मॉडल होता और हम गांधी की कल्पना के अधिक करीब होते। आज जिस पंचायती राज की बात हो रही है, वह तो महज एक कानून है। यह जड़ से उपजी व्यवस्था नहीं है।” अपने इसी सोच को देवदत्त ने कागज पर उतारा है।

उन्होंने आजाद भारत में सकारात्मक प्रतिरोध की पत्रकारिता शुरू की। ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ को इसका माध्यम बनाया। हालांकि, वे चाहते तो सरकारी नौकरी आसानी से प्राप्त कर सकते थे। मुख्यधारा की मीडिया का हिस्सा बन सकते थे, लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। देवदत्त ने हमेशा सत्ता से एक निश्चित दूरी बनाए रखी। राजनीति गतिविधि को दूर से ही देखते-समझते रहे। जब कभी जरूरत पड़ी तो अपने लेख के माध्यम से हस्तक्षेप किया। पुणे में जो काम ‘सत्याग्रही’ कर रहा था और कोलकाता में ‘फ्रंटियर’।

दिल्ली में वही भूमिका ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ की थी। मात्र एक पेज से यह पत्रिका शुरू हुई थी और धीरे-धीरे 12 पेज की हो गई। देवदत्त ने 1972 से 1979 तक ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ समाचार साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया। उन दिनों देश के बौद्धिक वर्ग के बीच इस पत्रिका ने अपनी खास पहचान बनाई थी, जिसकी कमी आज भी लोगों को महसूस होती है।

देवदत्त बताते हैं कि पत्रकारिता की तरफ उनका रूझान स्वाभाविक था। वैसे इसके पीछे कोई मिशन का भाव नहीं था, बल्कि मानव स्वभाव का स्वाभाविक स्फूर्ति थी। आज जब पत्रकारिता में प्रतिरोध का स्वर मुखर होना लगभग बंद हो गया है तो प्वाइंट ऑफ व्यू को याद करना आश्चर्य की बात नहीं है।


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