भगत सिंह की नजर में नेहरू
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भगत सिंह की नजर में नेहरू
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भगत सिंह की नजर में नेहरू
इतिहास का सच है कि भारतीय क्रांतिकारियों में भगत सिंह और उनके कुछ साथी उम्र और अनुभव की कमी के बावजूद असाधारण बौद्धिक थे।
नई दिल्ली | इतिहास का सच है कि भारतीय क्रांतिकारियों में भगत सिंह और उनके कुछ साथी उम्र और अनुभव की कमी के बावजूद असाधारण बौद्धिक थे।
इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख्त जरूरत है और यह पंडित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए। लेकिन जहां तक विचारों का संबंध है, वहां तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्कलाब के वास्तविक अर्थ, हिंदुस्तान में इंकलाब की आवश्यकता, दुनिया में इंकलाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें।’- भगत सिंह

भगतसिंह ने अपनी राजनीतिक मान्यताएं खुद स्थिर की थीं। उनका परिवार कांग्रेस के प्रभाव में था। भगत सिंह ने भी गांधी, नेहरू, लाला लाजपत राय, सुभाष बोस और गणेश शंकर विद्यार्थी आदि को निकट से जानने की कोशिश की थी।  

कांग्रेस के ये नेता पूरा जनआंदोलन अपने कंधों पर उठाए हुए थे। उन दिनों अन्यथा चर्चित विवेकानंद साहित्य और गांधी की ‘हिंद स्वराज’ जैसी पुस्तक को क्रांतिकारियों द्वारा पढ़ने का कोई साक्ष्य नहीं मिलता।

भगतसिंह की कांग्रेस नेताओं से मुठभेड़ जिज्ञासा और शोध का विषय है। कांग्रेस और क्रांतिकारियों की अंगरेजी हुकूमत के खिलाफ मैदानी राजनीति के तेवर अलग-अलग थे। एक रास्ता परंपराओं, सामाजिक मान्यताओं बल्कि वर्जनाओं और स्वीकृत सिद्धांतों की पगडंडियों से होकर गुजरता था। दूसरा रास्ता कड़ियल, चट्टानी धरती और जंगलों की झाड़ियों को साफ करता हुआ मौलिक रास्ते की प्रतिकृति कहा जाता था।

गांधी और उनके साथी भगतसिंह और उनके साथियों को हिंसक रणनीति का समर्थक मानते थे, जबकि यह पूरा सच नहीं था। असेंबली बम कांड छद्म हिंसा का उदाहरण है, बल्कि सुनियोजित तरीके से बम को सुरक्षित जगह पर फेंकने से हिंसा-रहितता का। भगतसिंह ने एलान किया था कि क्रांति हिंसा की समानार्थी नहीं है। उन्हें योजनाबद्ध सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्रांति में विश्वास है। हिंसा का प्रतीकात्मक प्रयोग एक पराजित कौम में प्रतिरोध के साहस को दिखाने के उद्देश्य से प्रेरित है।

गांधी और भगतसिंह की वांछित भेंट नहीं हुई। इसके पहले गांधी पर भरोसा कर बंगाल के क्रांतिकारियों की रजामंदी के कारण क्रांतिकारी आंदोलन एकाध वर्ष के लिए स्थगित भी किया गया था। फिर भी भगतसिंह और साथियों को गांधी का पूरी तौर पर अहिंसा पर अवलंबित रहना और उसे अनिवार्य सिद्धांत या सामाजिक आदत के रूप में आत्मसात करने को कहना रास नहीं आया।

भगतसिंह ने कांग्रेस में दो परिचित नेताओं गांधी और लाला लाजपत राय की कड़ी आलोचना की है। सुभाषचंद्र बोस के प्रति आदर के बावजूद भगतसिंह उन्हें एक भावुक युवक नेता की तरह ही तरजीह देते थे। तत्कालीन राजनीति में जवाहरलाल नेहरू अकेले नेता थे जिन पर इस अग्निमय नायक ने पूरी तौर पर भरोसा किया था। नेहरू ने भी लगातार भगतसिंह की क्रांति शैली का गांधी के विरोध के बावजूद समर्थन किया।

अपनी ‘आत्मकथा’ में नेहरू ने लिखा ‘भगतसिंह अपने आतंकवादी कार्य के लिए लोकप्रिय नहीं हुआ, बल्कि इसलिए हुआ कि वह उस वक्त, लाला लाजपतराय के सम्मान और उनके माध्यम से राष्ट्र के सम्मान का रक्षक प्रतीत हुआ। वह एक प्रतीक बन गया। आतंकवादी कर्म भुला दिया गया, पर उसका प्रतीकात्मक महत्व शेष रह गया और कुछ ही महीनों के अंदर, पंजाब का हर कस्बा और गांव और कुछ हद तक उत्तरी भारत के शेष हिस्से में उसका नाम गूंज उठा। उस पर अनगिनत गाने गाए गए और जो लोकप्रियता उसने पाई, वह चकित करने वाली थी।’

नेहरू ने क्रांतिकारियों की गांधी द्वारा की गई भर्त्सना को लेकर कहा कि उनके कामों की भर्त्सना करना न्यायोचित नहीं है, बिना उन कारणों को जाने जो इसके पीछे हैं। लाहौर में दिसंबर 1928 में सांडर्स की हत्या के तुरंत बाद नेहरू ने नौजवान भारत सभा को आश्वासन दिया कि ‘भारत में अनेकों आपके लिए हमदर्दी रखते हैं और हर संभव सहायता देने के लिए तैयार हैं। मुझे उम्मीद है कि सभा संगठन के रूप में और मजबूत होगी और भारत के एक राष्ट्र के रूप में निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगी।’ (सर्च लाइट, 11 जनवरी 1929)
भगतसिंह और साथियों की गिरफ्तारी के बाद नेहरू भूख हड़ताल पर बैठे कैदियों से व्यक्तिगत तौर पर मिले और उनके बुरे हालात पर संजीदा होकर बोले: ‘मुझे इनसे पता चला है कि वे अपने इरादे पर कायम रहेंगे, चाहे उन पर कुछ भी गुजर जाए। यह सच है कि उन्हें अपनी कोई परवाह नहीं थी।’ नेहरू ने पदलोलुप कांग्रेसियों को नहीं बख्शा, जो क्रांतिकारियों की आलोचना उनके बलिदान की भावना को समझे बिना करने लगते थे।

‘ट्रिब्यून’ की 11 अगस्त 1929 की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेहरू ने कहा था, ‘हमें इस संघर्ष के महान महत्त्व को समझना चाहिए जो ये बहादुर नौजवान जेल के अंदर चला रहे हैं। वे इसलिए संघर्ष में नहीं हैं कि उन्हें अपने बलिदान के बदले लोगों से कोई पुरस्कार लेना है या भीड़ से वाहवाही लूटनी है। इसके विपरीत आप संगठन और स्वागत-समिति में पद के लिए कांग्रेस में दुर्भाग्यपूर्ण खींचातानी को देखें। मुझे कांग्रेसियों के बीच आंतरिक मतभेदों के बारे में सुनकर शर्म आती है। परंतु मेरा दिल उतना ही खुश भी होता है जब मैं इन नौजवानों के बलिदानों को देखता हूं जो देश की खातिर मर-मिटने के लिए दृढ़ संकल्प हैं।’

असेंबली बम कांड में क्रांतिकारियों के बयान को नेहरू ने कांग्रेस बुलेटिन में प्रकाशित कर दिया। इसके लिए गांधी ने उन्हें फटकार लगाई। नेहरू ने संकोच के साथ गांधी को लिखा ‘मुझे खेद है कि आपको मेरा भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के बयान को कांग्रेस बुलेटिन में देना सही नहीं लगा। यह बयान इसलिए छापना पड़ा। क्योंकि कांग्रेसी हलकों में प्राय: इस कार्रवाई की सराहना हुई।’ कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर 26 जनवरी 1930 को नेहरू ने प्रेस विज्ञप्ति में कहा ‘हमारे राष्ट्रीय तिरंगे झंडे और मजदूरों के लाल झंडे के बीच न कोई दुश्मनी है और न होनी चाहिए। मैं लाल झंडे का सम्मान करता हूं और उसे इज्जत बख्शता हूं क्योंकि यह मजदूरों के खून और दुखों का प्रतीक है।’

एक महत्त्वपूर्ण लेख में जुलाई 1928 में ‘किरती’ में नेहरू को लेकर भगतसिंह ने अपने तार्किक विचार रखे। भगतसिंह को नेहरू का यह तर्क बेहद पसंद आया जिसमें उन्होंने कहा था ‘प्रत्येक नौजवान को विद्रोह करना चाहिए। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्र में भी।’ धार्मिकता के लबादे में लिपटे विचारों की सान पर चलकर क्रांति नहीं हो सकती- ऐसा नेहरू का तर्क रहा है।

भगतसिंह ने नेहरू के इस कथन का दुबारा उद्धरण दिया। ‘वे कहते हैं कि जो अब भी कुरान के जमाने के, अर्थात तेरह सौ बरस पीछे के अरब की स्थितियां पैदा करना चाहते हैं या जो पीछे वेदों के जमाने की ओर देख रहे हैं उनसे मेरा यही कहना है कि यह तो सोचा भी नहीं जा सकता कि वह युग वापस लौट आएगा। वास्तविक दुनिया पीछे नहीं लौट सकती। काल्पनिक दुनिया को चाहे कुछ दिन यहीं स्थिर रखो। इसीलिए वे विद्रोह की आवश्यकता महसूस करते हैं।’ नेहरू समाजवादी सिद्धांतों के अनुसार ही पूर्ण स्वराज्य पाने की परिकल्पना करते थे। उनके लिए केवल सुधार और तत्कालीन सरकारी मशीनरी की ढीली-ढाली मरम्मत के जरिए वास्तविक स्वराज्य को पाना संभव नहीं था।

भगतसिंह ने कहा था कि जवाहरलाल नेहरू अकेले नेता हैं जो राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरों से निकल कर खुले मैदान में आ गए हैं। पंजाब के नौजवानों का आह्वान करते हुए भगतसिंह ने लिखा था: ‘इस समय पंजाब को मानसिक भोजन की सख्त जरूरत है और यह पंडित जवाहरलाल नेहरू से ही मिल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अंधे पैरोकार बन जाना चाहिए। लेकिन जहां तक विचारों का संबंध है, वहां तक इस समय पंजाबी नौजवानों को उनके साथ लगना चाहिए, ताकि वे इन्कलाब के वास्तविक अर्थ, हिंदुस्तान में इंकलाब की आवश्यकता, दुनिया में इंकलाब का स्थान क्या है, आदि के बारे में जान सकें।’

अपने महत्त्वपूर्ण दस्तावेज ‘क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा’ में भगतसिंह ने एक तरह का प्रमाणपत्र दिया: ‘हमारे नेता किसानों के आगे झुकने की जगह अंगरेजों के आगे घुटने टेकना पसंद करते हैं। पंडित जवाहरलाल को छोड़ दें तो क्या आप किसी भी नेता का नाम ले सकते हैं जिसने मजदूरों या किसानों को संगठित करने की कोशिश की हो। नहीं, वे खतरा मोल नहीं लेंगे। यही तो उनमें कमी है। इसीलिए मैं कहता हूं वे संपूर्ण आजादी नहीं चाहते।’ ‘किरती’ में ही अगस्त 1928 में प्रकाशित ‘लाला लाजपत राय और नौजवान’ शीर्षक के अपने लेख में भगतसिंह ने लाजपत राय की कड़ी आलोचना की जो उग्र विचारों वाले नौजवानों के भाषणों से जनता को बचाने की पैरवी कर रहे थे। लाजपत राय ने अपवादस्वरूप यही कहा था कि अगर जवाहरलाल नेहरू ऐसा कह रहे हैं, तो उसमें नेकनीयती और समझबूझ होगी।

झल्लाकर भगतसिंह ने लिखा, ‘बहुत खूब! असल बात यह है कि जवाहरलाल नेहरू की हैसियत बहुत बड़ी हो गई है। उनका नाम कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए पेश हो रहा है। तो उम्मीद भी है कि वे जल्द ही अध्यक्ष बन भी जाएंगे। उनके विरुद्ध लिखने पर र्इंट का जवाब पत्थर से मिलने का भय होता है, लेकिन गुमनाम नौजवानों के लिए जो मन में आए कौन पूछता है।’
आज देश में संघ परिवार और उसके ‘शो ब्वॉय’ नरेंद्र मोदी, सरदार पटेल के कंधे का इस्तेमाल करते हुए नेहरू के चरित्र पर अवांछित हमले कर रहे हैं। उनकी राय में जवाहरलाल ने लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को भारतीय संविधान में गूंथ कर कोई अपराध कर दिया है। यह संयोग है कि नेहरू के उत्तराधिकारी लगातार भारतीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं। जिस विचारधारा ने आजादी की लड़ाई में खुद को महफूज रखा, वह इस बात से खौफजदा है कि नेहरू-गांधी परिवार राजनीति के शिखर पर कब तक काबिज रहेगा। इसलिए उसने कांग्रेस के सभी हिंदुत्व समर्थक नेताओं को अपने पूर्वज होने का प्रमाणपत्र जारी कर दिया है।

यह अलग बात है कि मनमोहन सिंह की अगुआई में खुद कांग्रेस को आर्थिक सुधारों के नाम पर संविधान के नेहरू और इंदिरा-प्रणीत मकसदों से लेना-देना नहीं बचा है। फिर भी नेहरू भारत में गांधी के अतिरिक्त अकेले नेता हैं जिनकी स्थायी प्रतिनिधिक अंतरराष्ट्रीय छवि है। यह उत्कर्ष इतिहास में फिलहाल अपने लिए वांछित पात्र ढूंढ़ रहा है। भगतसिंह ने उर्वर, उद्दाम और आंशिक अनगढ़ भाषा में नेहरू का वास्तविक और भविष्यमूलक मूल्यांकन किया था। देश में किसमें नैतिक साहस है कि कह सके कि उसे भगतसिंह के नेहरू-मूल्यांकन से कोई इत्तिफाक नहीं है। 

(कनक तिवारी का यह लेख जनसत्ता से साभार है।) 


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