वह न भूलने वाली टेस्ट पारी
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वह न भूलने वाली टेस्ट पारी
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वह न भूलने वाली टेस्ट पारी
बात 1987 की है। भारत पाकिस्तान सिरीज़ में जब पहले चार टेस्ट ड्रा हो गए और पांचवें और अंतिम टेस्ट में इमरान ख़ान अपने प्रिय अब्दुल क़ादिर को खिलाने पर अड़े हुए थे, मियांदाद और इमरान के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
नई दि्ल्ली  | बात 1987 की है। भारत पाकिस्तान सिरीज़ में जब पहले चार टेस्ट ड्रा हो गए और पांचवें और अंतिम टेस्ट में इमरान ख़ान अपने प्रिय अब्दुल क़ादिर को खिलाने पर अड़े हुए थे, मियांदाद और इमरान के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
"मैंने स्पिन लेते पिच पर इतनी बेहतरीन पारी अपने जीवन में नहीं देखी।"- जावेद मियांदाद

बात 1987 की है। भारत पाकिस्तान सिरीज़ में जब पहले चार टेस्ट ड्रा हो गए और पांचवें और अंतिम टेस्ट में इमरान ख़ान अपने प्रिय अब्दुल क़ादिर को खिलाने पर अड़े हुए थे, मियांदाद और इमरान के बीच तीखी नोकझोंक हुई।

खैर, मियांदाद इमरान को ये समझा पाने में कामयाब हो गए कि उस पिच पर इक़बाल क़ासिम अब्दुल क़ादिर से बेहतर साबित होंगे। क्रिकेट पंडितों की आलोचना का नतीजा ये रहा कि बंगलौर के क्यूरेटर ने स्पोर्टिंग पिच बनाने का फ़ैसला किया।

उस मैच में भारत के लिए विकेटकीपिंग कर रहे किरण मोरे को वो पिच अभी तक याद है, "होली का माहौल था और होली जैसी ही पिच थी जिसके दो अलग अलग रंग थे। पिच को बिल्कुल भी रोल नहीं किया गया था। पहली गेंद से ही गेंद टर्न हो रही थी और टिप्पा खाने पर मिट्टी निकल रही थी। इस पिच पर जितने भी फ़ास्ट बॉलर थे वो फ़ास्ट गेंद न कर इन कटर मार रहे थे।"

पाकिस्तान की पूरी टीम सिर्फ़ 116 रन बना सकी मनिंदर सिंह ने सिर्फ़ 27 रन दे कर 7 विकेट लिए। दिन का खेल समाप्त होने पर भारत ने 2 विकेट खो कर 68 रन बना लिए थे।

अगले दिन दिलीप वैंगसरकर ने 50 रन बनाए और वो और रवि शास्त्री स्कोर को पाकिस्तान के पार ले गए। लेकिन तभी भारतीय टीम लड़खड़ाई और पूरी टीम 145 रनों पर सिमट गई।

दूसरी पारी में पाकिस्तान ने थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया को वो स्कोर को 249 तक खींच कर ले गए। इमरान ख़ान ने जावेद मियांदाद को रमीज़ राजा के साथ ओपनिंग करने भेजा और इक़बाल क़ासिम को पांचवें नंबर पर प्रमोट किया।

पाकिस्तान के स्कोर को 249 तक ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका थी सलीम यूसुफ़ की, जिन्होंने 41 नाबाद रन बनाए और तौसीफ़ के साथ मिल कर नवें विकेट के लिए 51 रन जोड़े।

भारत को जीतने के लिए 221 रनों का लक्ष्य मिला लेकिन वसीम अकरम ने लगातार दो गेंदों पर श्रीकांत और मोहिंदर अमरनाथ को आउट कर पाकिस्तान को आगे कर दिया। जब तीसरे दिन का खेल समाप्त हुआ तो भारत के 4 विकेट पर 99 रन थे।

उस मैच में रेस्ट डे होली के दिन पड़ा था।उसी दिन शाम को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने दोनों टीमों के खिलाड़ियों के लिए उसी होटल में एक स्वागत समारोह रखा हुआ था. वहीं इकबाल क़ासिम की मुलाकात भारत के महान स्पिनर बिशन सिंह बेदी से हुई।

इक़बाल बताते हैं, "मैं और तौसीफ़ पार्टी में पहले पहुंच गए थे। तब तक वहां कोई नहीं आया था। बिशन बेदी कोने में बैठे हुए थे। हम उनके पास पहुंच कर बातें करने लगे। बातों बातों में मैंने उन्हें मुबारकबाद दी कि आप का शागिर्द मनिंदर सिंह बहुत अच्छा गेंदबाज़ है। बेदी बोले, यार पहली इनिंग में तो ठीक गेंदबाज़ी की उसने लेकिन दूसरी पारी में उसने इतने रन करवा दिए। ये कोई बॉलिंग हैं।"

"इतना बॉल ब्रेक हो रहा है। ये ऊपर से और ज़ोर लगा रहा है। बैट्समैन बीट हो रहा है, विकेटकीपर बीट हो रहा है। गेंद बल्ले पर लग ही नहीं रही है। इस पिच पर ऐसी गेंदें नहीं करनी चाहिए। मैं तो ख़ुश नहीं हूं उसकी बॉलिंग से। मैं वहीं समझ गया कि इस विकेट पर ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं है। मैं गेंद को टर्न नहीं कराउंगा। पिच से गेंद अपने आप टर्न हो जाए तो कोई बात नहीं। वो मनिंदर के बारे में बात कर रहे थे लेकिन सबक हम दोनों ने सीखा।"

कासिम और तौसीफ़ ने बेदी की बात पर पूरा अमल किया. लेकिन उनका सामना सुनील गावस्कर से था जो अपने अंतिम टेस्ट में अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी खेल रहे थे। 123 के स्कोर पर अज़हरुद्दीन ने इक़बाल क़ासिम को रिटर्न कैच दे दिया।

रवि शास्त्री और गावस्कर स्कोर को 155 तक ले गए। तभी शास्त्री का भी वही हश्र हुआ जो अज़हर का हुआ था। गावस्कर ने न सिर्फ़ एक छोर संभाला हुआ था, बल्कि इक़बाल क़ासिम और तौसीफ़ की भयानक टर्न लेती गेंदों पर स्ट्रोक पर स्ट्रोक लगा रहे थे। लगभग हर गेंद पर पाकिस्तानी गेंदबाज़ अपील कर रहे थे।

यहां तक कि पाकिस्तानी विकेटकीपर सलीम यूसुफ़ अपील करते हुए दौड़कर बॉलर के पास वाले अंपायर के पास पहुंच रहे थे। लेकिन गावस्कर पर उसका कोई असर नहीं पड़ रहा था। किरन मोरे याद करते हैं, "मैंने ऐसी इनिंग कभी नहीं देखी, ऐसी पिच पर और ऐसी क्वालिटी गेंदबाज़ी के ख़िलाफ़। ऐसी पिच पर बल्लेबाज़ी करना जहां बल्ले पर गेंद लग ही नहीं रहा था बहुत बड़ी बात थी। उनकी सबसे ख़ास बात थी गेंद को छोड़ना। उन्होंने कुल 264 गेंदे खेली। आप दोनों टीमों का स्कोर कार्ड उठा कर देख लीजिए। किसी ने भी 120 से अधिक गेंदे नहीं खेली उस पिच पर।"

मैंने कराची फ़ोन कर इक़बाल क़ासिम से संपर्क कर पूछा कि गावस्कर की उस इनिंग को आप किस तरह रेट करते हैं ? क़ासिम का जवाब था, "क्या बात है। आपको वो इनिंग क्रिकेट सीखने वाले लड़कों को दिखानी चाहिए. लोग उसको देखें कि कैसे स्पिन गेंदबाज़ी को खेलना चाहिए। बॉल इतनी ब्रेक हो रही थी. वो दीवार की तरह खड़े हुए थे। उनको गेंद करना मेरे लिए बहुत बड़े सम्मान की बात की थी। मेरे हाथ से गेंद निकलता था, वहां से वो अंदाज़ लगाते थे कि गेंद सीधी रहेगी या टर्न होगी और वो भी कितनी। बहुत ही असाधारण बैटिंग की है गावस्कर ने उस दिन।"

जब ये लगने लगा कि गावस्कर अकेले ही भारत को पाकिस्तान के पार ले जाएंगे, उन्हें इक़बाल क़ासिम की एक ऐसी गेंद मिली जिसे खेल पाना शायद किसी के लिए संभव नहीं था।

इकबाल क़ासिम बताते हैं, "जहाँ मेरा ध्यान भंग होता था, वो चौका मार देते थे. जब कभी गेंद पीछे पड़ जाती थी तो वो कट खेल जाते थे या ड्राइव कर देते थे. वो हाफ़ कॉक खेलते थे और लंबा स्ट्रेच नहीं करते थे। तेज़ स्पिन होती गेंद को वो निकल जाने देते थे. हम हा हू करते रहते थे, लेकिन उनकी सेहत पर असर नहीं पड़ता था। जिस गेंद पर वो आउट हुए थे वो बहुत कम ब्रेक हुई थी और बल्ले को चूमती हुई स्लिप में चली गई थी. अगर वो थोड़ी ज़्यादा ब्रेक हुई होती तो गावस्कर ने उसे खेला ही नहीं होता।"

गावस्कर के आउट होते ही ये साफ़ हो गया कि पाकिस्तान जीत की तरफ़ बढ़ रहा है। रोजर बिन्नी ने छक्का लगा कर उम्मीद की एक किरण जगाई लेकिन वो क्षणिक था. पाकिस्तान ने ये मैच 16 रनों से जीत कर सिरीज़ 1-0 से जीत ली।

मैच के बाद इमरान ख़ान ने कहा कि ये गावस्कर के जीवन की सर्वश्रेष्ठ पारी थी। जावेद मियांदाद ने भी अपनी आत्मकथा 'कटिंग एज' में लिखा, "मैंने स्पिन लेते पिच पर इतनी बेहतरीन पारी अपने जीवन में नहीं देखी।"

मशहूर पत्रकार सुंदर राजन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 17 मार्च 1987 के अंक में लिखा, 'क्या बेहतरीन खेल! क्या ग़ज़ब की तकनीक! इस दिन गावस्कर भारत की तरफ़ से वन मैन आर्मी थे। आप यकीन नहीं करेंगे। वो दोनों छोर से खेल रहे थे।"

सबसे बड़ी तारीफ़ मुदस्सर नज़र की तरफ़ से आई थी। उन्होंने लिखा, " गावस्कर इस तरह बैंटिंग कर रहे थे, जैसे वो किसी सीमेंट पिच पर खेल रहे हों। हम सबके लिए बैटिंग का ये एक ऐसा पाठ था जिसे हम तो क्या, बल्लेबाज़ों की आने वाली पीढ़ियां कभी नहीं भूल पाएंगी।"

(रेहान फजल का यह लेख बीबीसी हिन्दी से साभार है।)


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