बन्नी के मालधारी की कहानी
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बन्नी के मालधारी की कहानी
   रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
बन्नी के मालधारी की कहानी
घुमंतू जातियां अंतर्मुखी होती हैं। स्वभाव से सरल और निर्मल। ठीक प्रकृति की तरह। इनमें भी मालधारी हों तो कहने ही क्या हैं!
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नई दि्ल्ली  | घुमंतू जातियां अंतर्मुखी होती हैं। स्वभाव से सरल और निर्मल। ठीक प्रकृति की तरह। इनमें भी मालधारी हों तो कहने ही क्या हैं!
पानी का सदुपयोग कोई सीखे तो इन मालधारियों से। कच्छ की भौगोलिक बनावट बेशक जैव विविधता से भरपूर है। वहां जंगली जानवर भी हैं, लेकिन मालधारियों का अपना कौशल है। वे प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने मवेशियों की परवरिश करते हैं।

यदि उन्हें जानना और समझना हो तो पास रहना होगा। सुषमा अयंगर और उनके साथियों की तरह। वे वर्षों से घुमंतू जातियों के बीच सक्रिय हैं। उनकी जीवनशैली, स्वभाव और रीति-रिवाज को बारीकि से पहचानने लगे हैं। अब इनके जीवन संसार से लोगों का साक्षात्कार करा रही हैं। यहां पढ़ें पूरी रिपोर्ट-

‘कम संसाधन में प्रकृति के साथ जुड़कर जीवन को कैसे जिया जाता है, यह कोई घुमंतू जातियों से सीखे।’ सुषमा अयंगर जो कुछ दिखा और बता रही थीं, उसका सार यही था। वे ‘लिविंग लाइटली’ नाम की प्रदर्शनी से हमारा सीधा परिचय करा रही थीं। इस दौरान वे बोली, “घुमंतू जातियों के जीवन में विज्ञान छिपा होता है। उनकी जीवनशैली में एक तरह की कला है। हमलोगों ने उनमें छिपी हुई कला और विज्ञान को सामने लाने की कोशिश की है।” सुषमा अयंगर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में घुमंतू जातियों के जन-जीवन पर लगी प्रदर्शनी को दिखाते हुए यह जानकारी दे रही थीं। सहजीवन, आईजीएनसीए और एफईएस के तत्ववाधान में यह प्रदर्शनी 2 से 18 दिसंबर तक आईजीएनसीए में लगी थी।

वह प्रदर्शनी अपने तरह की अनूठी थी। अक्सर होता यह है कि प्रदर्शनी में कलात्मक पक्ष को अधिक उभारा जाता है। यही रिवाज चला आया है। यहां दृश्य अलग था। प्रदर्शनी में घुमंतू जातियों के कलात्मक पक्ष को तो रखा ही गया था। इसके साथ-साथ उनकी जीवनशैली, राग-रंग, भाव-भक्ति और आर्थिक पक्ष को बखूबी उभारा गया। प्रदर्शनी का शीर्षक था- लिविंग लाइटली।

लाल ऊंची पगड़ी पहने, परंपरागत रिवाज से लिपटी धोती और सफेद कुर्ता डाले पुरुषों का एक समूह आईजीएनसीए के परिसर में उन दिनों आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। वे लोग गुजरात के कच्छ से आए मालधारी थे यानी गुजरात के कच्छ में रहने वाली घुमंतू जाति। इनकी महिलाएं ठेठ परंपरागत पोशाक में दिखाई दे रही थीं।

परिसर में एक तरफ कच्छ से आए अब्दुल गनी आने-जाने वालों को एक खेल खेला रहे थे। उस खेल का इजाद खुद गनी भाई ने किया है। हालांकि, अब तक उन्होंने इस खेल का कोई नाम नहीं रखा है, लेकिन बातचीत के क्रम में वे बताते हैं, “परंपरागत ज्ञान में टिकाऊ विकास छुपा है। खेल के जरिए यही संदेश देने की कोशिश है।” विकास की इस अंधी दौड़ में गनी भाई बड़ी बात कह रहे थे। वे यहीं नहीं रुके, बल्कि आगे कहा, “प्रदर्शनी में ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जिसे देखकर आप महसूस करेंगे कि आधुनिक विकास के पास प्रकृति का कोई विकल्प नहीं है।”

प्रदर्शनी का प्रारूप विस्तृत था। पूरी प्रदर्शनी तीन बाड़े में लगी थी। पहला बाड़ा फोटोग्राफी और दृश्य-श्रव्य माध्यम का था। वहां मालधारियों की जीवनशैली और उनकी रीति-नीति को वित्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) के जरिए दिखाया जा रहा था। दूसरा बाड़ा उनके दैनिक जीवन में काम आने वाली सामग्रियों से भरा था। तीसरा और अंतिम बाड़ा कलादीर्घा से बाहर तंबू में सजा था। वहां उन सामग्रियां को प्रदर्शित किया गया था जो मालधारियों के परिश्रम और साधनों से तैयार होती हैं। इनमें ऊंट की खाल से बने थैले से लेकर ऊन से बने पोशाक रखे थे।

प्रदर्शनी का नेतृत्व कर रहीं सुषमा अयंगर इस बाबत कहती हैं, “सच कहा जाए तो अब तक इस तथ्य को नजरअंदाज किया जाता रहा है कि घुमंतू जातियां हमारी अर्थव्यवस्था में कोई योगदान देती हैं। लेकिन, यहां प्रदर्शनी के जरिए हमलोगों ने इस बात को समझाने की कोशिश की है कि देश की अर्थव्यवस्था में इनका भी योगदान है।” सहजीवन से जुड़े संदीप विरवानी इस बात को विस्तार देते हैं। उन्होंने कहा, “घुमंतू जातियां जो आर्थिक उत्पादन करती हैं, उसका पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है। वे कुदरत से कुछ लेती नहीं हैं, बल्कि जितना संभव होता है, उसे संवर्धित करते चलती हैं।”

बहरहाल, प्रदर्शनी की शुरुआत भारत के मानचित्र से की गई थी। वह मानचित्र विशेष उद्देश्य से तैयार किया गया था। मानचित्र में इस बात को खासकर उभारा गया था कि भारत में घुमंतू जातियां किन-किन स्थानों पर निवास करती हैं। साथ ही यह भी दिखाया गया था कि घुमंतू जातियां पूरे साल मौसम के साथ अपना बसेरा बदलती जाती हैं और उनकी यात्रा का क्रम आगे बढ़ता जाता है। इस संदर्भ में सुषमा अयंगर ने एक दिलचस्प जानकारी दी। उन्होंने बताया, “गुजरात में एक ऐसी घुमंतू जाति है, जिसके लोग अपने जीवनकाल में पूरी पृथ्वी के चार चक्कर लगाने के समान यात्रा कर लेते हैं। वे प्रकृति के अनुकूल जीवन जीते हैं, इसलिए उनका जीवन लंबा होता है।”

उन्होंने यह भी साफ किया कि घुमंतू जातियों के बारे में हमारी समझ सीमित है, इसलिए उनके जीवन पर रोशनी डालने के लिए ‘सहजीवन’ नाम की संस्था काम कर रही है। इसकी योजना घुमंतू जातियों से जुड़ी जानकारी और समझ को आम लोगों तक पहुंचाना है। इसी उद्देश्य के तहत यह प्रदर्शनी आयोजित की गई। इस श्रृंखला की यह पहली प्रदर्शनी थी, जिसमें कच्छ के मालधारी केंद्र में थे।

प्रदर्शनी से यह बात स्पष्ट हो रही थी कि मालधारियों का पूरा जीवन पशुओं पर निर्भर है। यूं समझा जाए कि वे एक दूसरे के पूरक हैं। ऊंट, बन्नी भैंस, गाय और भेड़-बकरी के साथ मालधारी पूरा जीवन गुजार देते हैं। अब मुश्किल यह है कि मालधारियों के बच्चे अपने माता-पिता और दादा-दादी की तरह जीवन नहीं जीना चाहते हैं। वे दूसरा पेशा चुन रहे हैं। खासकर ड्राइवरी का। हालांकि, इनके बीच ऐसे भी हैं, जिन्हें कामगारों की दुनिया पसंद नहीं है। उनकी माने तो- “हमारे जीवन में संघर्ष है, लेकिन हम उसमें खुश हैं। नौकरी की गुलाम जिंदगी हमें पसंद नहीं है।” एक शोध के बाद सुषमा अयंगर अपने साथियों के साथ उक्त निष्कर्ष पर पहुंची हैं। प्रदर्शनी में लगी कुछेक तस्वीरों को दिखाते हुए वे पूरी कहानी बात जाती हैं। उन तस्वीरों को मालधारियों के 20 बच्चों ने थोड़े प्रशिक्षण के बाद कैमरे में कैद किया है। अपने समाज के जन-जीवन को कैमरे में कैद करते वक्त उन्होंने अपना विचार बदल लिया है। अपनी बिरादरी के साथ जीवन जीने का मन बना लिया है। मालधारी समाज के भविष्य के लिए यह विचार सुखद है।

वहीं वित्तचित्र में यह दिखाया गया है कि मालधारी महिलाएं अपनी पोतियों को तीन सीख देना नहीं भूलती हैं- ‘दूध से घी न निकालना। अपनी चुन्नी का सौदा न करना और हमेशा घास की झोपड़ी में रहना।’ यहां शुद्धता बरतने और प्रकृति के नजदीक रहने की जैसी सलाह मालाधारी महिलाएं अपनी लड़कियों को दे रही हैं, वह कोई साधारण ज्ञान नहीं है। इसमें रहस्य छुपा है। इन्हीं रास्तों पर चलकर कम संसाधनों और प्रकृति के साथ जुड़ कर मालधारी अपनी रंग-बिरंगी संस्कृति में रचे-बसे हैं। पूरी प्रदर्शनी इससे हमारा साझात्कार कराती है।

कच्छ यानी कछुए के आकार का भू-भाग। यहां का जीवन संघर्ष से भरा है। एक तरफ नमक-भरा रण है तो दूसरी तरफ लवणीय दलदली भूमि। कहीं लंबे घास के मैदान हैं, तो कहीं कुछ और। लेकिन, इन सबके बीच भी मालधारी अपने जीवन का आधार ढूंढ़ लेते हैं। प्रदर्शनी में उनके जीवन-संघर्ष को सफल तरीके से दर्शाया गया है। मीठे पानी के श्रोत तक पहुंचने की कला तो उनकी वैज्ञानिक दृष्टि को जाहिर करता है। वे पानी की बूंद-बूंद का उपयोग करते हैं। पानी का सदुपयोग कोई सीखे तो इन मालधारियों से। कच्छ की भौगोलिक बनावट बेशक जैव विविधता से भरपूर है। वहां जंगली जानवर भी हैं, लेकिन मालधारियों का अपना कौशल है। वे प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने मवेशियों की परवरिश करते हैं। साथ-साथ अपना जीवनयापन करते हैं।

क्या यह कम आश्चर्य की बात है कि ऐसी परिस्थिति में भी मालधारी बन्नी भैंस और काकरेज गाय जैसी श्रेष्ठ देसी नस्ल का संरक्षण और संवर्धन करते आए हैं। वैज्ञानिक शोध के नाम पर पशु संवर्धन के जो दावे होते रहे हैं, वे इन मालधारियों के सामने बौने लगते हैं। यह बात ध्यान देने वाली है कि देश का राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो द्वारा भैंस की पंजीकृत 13 नस्लों में से ज्यादातर इसी घुमंतू चरवाहा व्यवस्था से विकसित हुई है। खैर, 2010 में यहां के मालधारियों और इस इलाके में कार्यरत गैर सरकारी संस्था ‘सहजीवन’ के प्रयास से बन्नी भैंस को देशी नस्ल के रूप मान्यता मिली है। प्रदर्शनी में बन्नी भैंस के कई चित्र प्रदर्शित किए गए थे। इसका एक प्रतिरूप भी रखा गया था। मालधारी इस बात पर गर्व करते हैं कि उनके बन्नी भैंस की कीमत एक लाख रुपए है।

कच्छ से आए गनी भाई बताते हैं- “मालधारी दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है- माल यानी पशुधन। दूसरा शब्द है- धारी यानी धारण करने वाला। इस तरह मालधारी बना है।” वे गाय, भैंस, ऊंट, बकरी जैसे पशुओं को पालते हैं।

संदीप विरवानी कहते हैं, “पशु लंबी दूरी की यात्रा कर चारे-पानी से अपना पेट भरते हैं। इस दौरान कई तरह के घास फूस को वे आहार के तौर पर लेते हैं, जिससे इनके दूध की गुणवत्ता 14 से 15 गुना बढ़ जाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक हो जाती है। मालधारियों के जीवन का यह बहुत बड़ा आधार है।” प्रदर्शनी में एक जगह अलग-अलग आकार-प्रकार की सैकड़ों घंटियां टंगी दिखी। ये घंटियां पशुओं के गले में बांधी जाती हैं। भिखा भाई रबारी ने बताया कि जानवरों के गले में बंधी घंटी का बड़ा महत्व है। एक पशु अपने साथी पशु की घंटी सुनकर रास्ते का अनुसरण करता है। रात के वक्त मालधारी भी अपने पशु की पहचान उसकी घंटी से करते हैं।

सहजीवन के लोग बताते हैं कि मालधारियों का परंपरागत ज्ञान अनूठा है। वे देशी नस्लों के मवेशियों का संवर्धन तो करते ही हैं। इसके साथ-साथ कढ़ाई-बुनाई की कला में भी पारंगत होते हैं। इनकी पोशाक में कढ़ाई-बुनाई का खास महत्व होता है। यही वजह थी कि प्रदर्शनी के दौरान वे अपनी रंग-बिरंगी पोशाक से ही पहचाने जा रहे थे। इनका संगीत से गहरा जुड़ाव रहा है। अपने मवेशियों को चराने ले जाते समय वे जोडिया पावा यानी बांसुरी की जोड़ी जैसे वाद्य यंत्र को ले जाना नहीं भूलते हैं। यह मालधारियों का परंपरागत वाद्य यंत्र है। प्रदर्शनी इस बात की झलक देती है।

स्मरण रहे कि कच्छ का बन्नी एक सूखा इलाका है। यहां मालधारी अपने और मवेशियों के लिए विरदा पद्धति से वर्षा जल को एकत्र करते हैं। यह मालधारियों की परंपरागत जल संरक्षण पद्धति है। मालधारी पानी की जगह खोजने व खुदाई करने में माहिर हैं। वित्तचित्र में इस बात को बेहतर तरीके से दिखाया गया है। बन्नी जिस तरह मवेशियों की देसी नस्लों के लिए प्रसिद्ध है,  उसी तरह अपने लम्बे-चौड़े चारागाहों के लिए जाना जाता है।

यहां घास की 40 प्रजातियां हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से चारागाह में कमी आई है। यहां विलायती बबूल का काफी फैलाव हो गया है। स्थानीय भाषा में इसे गांडो बावेल कहते हैं। इसकी पत्तियां खाकर मवेशी बीमार होती है और मर जाते है। इससे मालधारी चिंतित हैं। प्रदर्शनी में जिस वित्तचित्र को दिखाया गया है, उसमें विलायती बबूल के इस जंगल का विस्तार से वर्णन है। इस बात की भी चर्चा है कि इलाके में आधुनिक विकास की हवा ने दस्तक दे दी है। इससे मालधारियों की चिंता बढ़ गई है। वे कहते हैं- हमारा इलाका पशुपालक का है। इसे वैसा ही रहने दो। इनका नारा है- ‘बन्नी को बन्नी रहने दो।’

मालधारियों में सदियों से प्रकृति के साथ जीने की कला है। इन्होंने मवेशियों की देसी नस्लें बनाई और बचाई हैं। पानी की परंपरागत विरदा पद्धति का ईजाद किया है। वे पेड़-पौधे और वनस्पतियों के जानकार हैं। देसी जड़ी-बूटियों से मवेशियों का इलाज कर लेते हैं। वे स्वावलंबी जीवन जीते हैं। किसी पर निर्भर नहीं हैं। प्रकृति से जितना लेते हैं, उससे कहीं ज्यादा अलग-अलग रूपों में वापस कर देते हैं। इसके बावजूद इनके ज्ञान-विज्ञान को नहीं समझा गया है। प्रदर्शनी में इन बातों को गहराई से दिखाया समझाया गया है।

यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पूरी प्रदर्शनी का अवलोकन करने के बाद कहा, “घुमंतू जातियों के विषय में अपना ज्ञान समृद्ध कर लौट रही हूं।” स्मरण रहे कि 2 दिसंबर को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह प्रदर्शनी का उद्घाटन किया था। सुषमा अयंगर ने बताया कि सोनिया गांधी समेत कई केंद्रीय मंत्री, प्रोफेसर, शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रदर्शनी देखने आए। इनमें महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी भी शामिल थीं।

सुषमा ने यह भी जानकारी दी कि देश में घुमंतू जातियों की संख्या 3.50 करोड़ है। प्रदर्शनी के दौरान तीन बार दास्ता-ए-खानाबदोश की प्रस्तुति हुई। अपनी प्रस्तुति में अंकित चड्डा ने मालाधारियों के जीवन पर प्रकाश डाला। चूंकि मालधारी निर्गुण धारा से गहरे प्रभावित रहे हैं। वे शाह अब्दुल लतीफ भटाई के करीब रहे हैं, इसलिए भटाई के पद का गायन प्रस्तुत किया गया।


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