कई एनजीओ सरकार के भोंपू हैं: कैलाश सत्यार्थी
एनजीओ, गैर सरकारी संस्थान, बचपन बचाओ आंदोलन, भारत, भारतीय समजा, बाल मजदूरी
कई एनजीओ सरकार के भोंपू हैं: कैलाश सत्यार्थी
   गुरुवार | जनवरी १८, २०१८ तक के समाचार
कई एनजीओ सरकार के भोंपू हैं: कैलाश सत्यार्थी
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दिल्ली | “गैर सरकारी संगठन का पैसा भारतीय समाज के चरित्र को बदल रहा है।” ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणेता कैलाश सत्यार्थी ने यह बात कही।
2014 का नोबेल शांति पुरस्कार बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से दिया गया है।
“अकसर लोग एनजीओ खोलने की बात ऐसे बताते हैं जैसे रोजगार के लिए कोई दुकान खोला हो।”-- कैलाश सत्यार्थी (बचपन बचाओ आंदोलन)

कैलास सत्यार्थी ने कहा कि गैर सरकारी संगठन का काम है कि वह कल्यणकारी कार्यों के लिए सरकार पर दबाव बनाए। जनआंदोलन के माध्यम से राज्य पर दबाव बनाए। पर आज, स्थिति इसके विपरीत है। कई एनजीओ सरकार के भोंपू बने हुए हैं। सत्यार्थी दिल्ली के आईटीओ यमुना पुल के निकट स्थित शिवमंदिर के प्रांगण में गत सात अप्रैल को ‘एनजीओ और भारतीय समाज’ विषय पर बोल रहे थे। कार्यक्रम का आयोजन प्रभाष परंपरा न्यास व प्रज्ञा संस्थान के तत्वावधान में किया गया था।

इस अवसर पर सत्यार्थी ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा, “अकसर लोग एनजीओ खोलने की बात ऐसे बताते हैं जैसे रोजगार के लिए कोई दुकान खोला हो।” एनजीओ के विकासक्रम पर इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “संरक्षण का भाव भारतीय समाज के रग-रग में था। महात्मा गांधी ने इसे एक रूप दिया, पर समय के साथ-साथ जब युवा वर्ग यह समझने लगा कि सत्ता प्रतिष्ठान गांधी के नाम पर भ्रम फैला रहा है तो उनका भोह भंग हुआ। जेपी आंदोलन से भी उसका भ्रम टूटा तो कुछ लोग अलग कोशिश करने लगे। वे गैर सरकारी प्रयोग थे।” आगे उन्होंने कहा कि इसी दौरान मानवाधिकार के नाम पर गैर सरकारी संगठन का एक तपका निकला। दूसरा तपका सेवा के नाम पर अस्तित्व में आया। बाल मजदूरी के खिलाफ हमने भी अभियान चलाया। सड़क से लेकर कोर्ट तक हमने बाल मजदूरी के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसलिए नाम भी ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ रखा।

उन्होंने जोर देकर कहा, “अगर देश का बालक आज भी गुलामी करने को मजबूर हो रहा है तो मानना चाहिए कि कानून वाहियात हो चुका है और संसद अपने उद्देश्यों में असफल रहा है। ” बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यक्रमों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा कल्याणकारी काम है या फिर शिक्षा मौलिक अधिकार है। इस पर मैंने बहस शुरू की। स्वास्थ्य को लेकर भी ऐसी ही बहस शुरू की गई। प्रत्येक मंच से मैंने इस बहस को आगे बढ़ाया। खैर, बहस और संघर्ष दोनों जारी है। मैं मानता हूं कि अभी बड़ा परिवर्तन होना है और इसके लिए आंदोलन की जरूरत है। पांच सितारा एनजीओ से काम नहीं चलने वाला है, जबकि ऐसे कई गैरसरकारी संस्थान उग आए हैं। वे इवेंट कंपनियों से मिलकर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं। भारतीय समाज का हवाला देते हुए कहा कि यहां सेवा भाव हमेशा से रहा है। लोग अपनी इच्छा से दूसरों के लिए कुछ करना चाहते हैं। प्याउ और लंगर के रूप में यह दिखता आया है। बेशक इसका एक धार्मिक पक्ष भी है, पर यह मानना होगा कि संरक्षण का भाव भारतीय समाज के रग-रग में बसा है। ऐसे काफी लोग हैं जो ईमानदारी से जनता की ताकत को उभारने का काम कर रहे हैं। इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि सब गलत ही हो रहा है।  

वहीं स्विटजरलैंट से आए मार्शल सलामोर्ड ने भारत से जुड़े अपने अनुवभों को साझा किया। उन्होंने कहा कि एक आंकड़े के मुताबिक भारत में एनजीओ की संख्या करीब 33 लाख है। यह मेरे लिए आश्चर्यजनक है। यह जानकर एकबारगी अटपटा लगा कि भारत में इतने एनजीओ की जरूरत है। जब मैं भारत आया तो मुझसे सवाल किया गया कि आप यहां क्यों आए हैं? तब मेरे पास एक ही जवाब था, कि ‘मालूम नहीं। केवल इतना जानता हूं कि भारत मेरी मां की तरह है।’ भारत में अपने गतिविधियों की जानकारी देते हुए मार्शल ने कहा कि 1997 में हमने कोलकाता में एक एनजीओ का गठन किया। इसके तहत बिहार में दो स्कूल खोले। आगे चलकर राजस्थान में भी एक स्कूल खोला गया। भारत के गरीब परिवारों को सहयोग देना ही उन्होंने अपना पहला लक्ष्य बताया। मार्शल ने कहा कि स्कूल खोलने का अर्थ केवल यह नहीं है कि आप बच्चे को शिक्षा देते हैं। इसका मतलब यह भी है कि आप एक परिवार से जुड़े हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शिवकुमार मिश्र ने कहा कि हमारे सामने दो सवाल थे। पहला सवाल था कि पढ़कर नौकरी करनी है। दूसरा सवाल था कि समाज की बेहतरी के लिए संघर्ष करें। सवाल यह भी था कि क्या बदलाव गांधी के रास्ते हो सकता है? इन सवालों के बीच लोगों ने अलग-अलग रास्ते चुने, पर सवाल अभी भी बने हुए हैं।

विचार गोष्ठी के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में दिहाड़ी मजदूरी कर रहे मजदूरों के बच्चों ने मूक नाटक ‘कृतिकलश’ का मंचन किया। यह नुक्कड़ नाटक एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की कल्पाना करता है। गौरतलब है कि इन बच्चों के बीच संपर्क सोसाइटी नामकी गैर सरकारी संस्था पिछले कई सालों से काम कर रही है। कार्यक्रम का संचालन पत्रकार संत समीर कर रहे थे। कार्यक्रम में देवदत्त, प्रबाल मैत्र, रामबहादुर राय, मनोज मिश्र समेत कई पत्रकार व सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता मौजूद थे।


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