नेहरू से आगे निकले मोदी
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मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए जिस काम को पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार नहीं कर पाई थी, उसे नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कर दिखाया है। इससे उन्हें बधाई मिल रही है। 
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नेहरू से आगे निकले मोदी
मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए जिस काम को पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार नहीं कर पाई थी, उसे नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कर दिखाया है। इससे उन्हें बधाई मिल रही है। 
नई दिल्ली | मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए जिस काम को पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार नहीं कर पाई थी, उसे नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कर दिखाया है। इससे उन्हें बधाई मिल रही है। 
लोकसभा में भारी बहुमत से बहस के बीच बिल पास हो गया है। इस पर समाज में अलग-अलग प्रतिक्रिया है। मोदी सरकार को छवि महिलाओं की नजर में ऊपर उठी है।

 

दरअसल, तीन तलाक विधेयक लोकसभा में पारित हो गया। लंबी बहस के बाद बिल के खिलाफ सभी संशोधन खारिज कर दिए गए। अब इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा।

मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे। सदन ने सभी को खारिज कर दिया। इनमें तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई। जिसमें वह भी खारिज हो गया। बिल के अनुसार अगर कोई तलाक देता है, तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत मिलेगी।

गुरुवार को हंगामे के बीच कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बिल को लोकसभा में पेश किया।इस दौरान उन्होंने कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं। 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक इसलिए दिया गया, क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी।"

वे बोले, "महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक। सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक बताया जा चुका है। उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक हुए हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी 100 तीन तलाक हुए हैं।"

प्रसाद ने आगे कहा है, "इस्लामिक देश बांग्लादेश, मिस्र, मोरक्को, इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान में भी तीन तलाक को रेग्युलेट किया गया है।" उन्होंने कहा कि हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं। सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं।

प्रसाद ने कहा कि क्या सदन को खामोश रहना चाहिए? शरिया पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। यह बिल केवल तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्दत पर है। लोकसभा देश की सबसे बड़ी पंचायत से अपील है इस बिल को सियासत की सलाखों से न देखा जाए। दूसरी अपील है कि इसे दलों की दीवार से न बांधा जाए। साथ ही तीसरी अपील है कि इस बिल को मजहब के तराजू पर न तौला जाए। यह हमारी बहनों, बेटियों की इज्ज़त आबरू का बिल है।"

विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने इसे ऐतिहासिक मौका बताया है। उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है, क्योंकि देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है।"

स्मरण रहे कि अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर ताया जिनकिन ने 1960-61 में जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है? तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल ने कहा था, "हिंदू कोड बिल।"जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का।" इस पर नेहरू बोले-"वक्त सही नहीं था।"तो क्या वक्त सही आ गया है!  कहा जा रहा है कि कानून लोगों के भले के लिए बनता है। ये कानून तलाक के खिलाफ नहीं है, ये केवल तीन तलाक के खिलाफ है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि सरकार के बिल में कुछ खामियां हैं। हर कोई महिलाओं के अधिकार के पक्ष में है। बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजा जाए। हालांकि, सरकार ने खड़गे की मांग को खारिज कर दिया। संसद में उपस्थित कानून मंत्री प्रसाद ने तत्काल कहा कि जो सुझाव है वे संसद में ही दे दें।

भाजपा सासंद मीनाक्षी लेखी ने कहा है कितलाक दुखद प्रक्रिया है, जिसका परिणाम औरतों को ताउम्र सताता रहता है।

हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा है, "संसद को इस मसले पर कानून बनाने का कोई कानूनी हक नहीं है, क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है।"

वहीं राष्ट्रीय जनता दल के सांसद जयप्रकाश यादव ने कहा, "इस मसले पर मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से मशविरा और सहमति की कोशिश की जानी चाहिए। पति जेल में, पत्नी घर में, बच्चों की परवरिश कौन करेगा?"

इन बहसों के बीच यह बिल लोकसभा में भारी बहुमत से पास हो गया है। इस पर समाज में अलग-अलग प्रतिक्रिया है। मोदी सरकार को छवि महिलाओं की नजर में ऊपर उठी है।


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