बैरिस्टर कैसे बने महात्मा
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मशहूर इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने १ अक्टूबर को प्रकाशित अपनी पुस्तक 'गांधी बिफोर इंडिया' में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन के शुरआती वर्षों के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है।
नयी दिल्ली | मशहूर इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने १ अक्टूबर को प्रकाशित अपनी पुस्तक 'गांधी बिफोर इंडिया' में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन के शुरआती वर्षों के कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला है।
लंदन के छात्र जीवन में गांधी ने समाजसेवा या राजनीति के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। लंदन से लौटने पर गांधी अंग्रेजों से काफी प्रभावित थे। वे काले रंग के गोरे साहब ही थे।

पेंगुइन इंडिया द्वारा प्रकाशित इस नई पुस्तक में गुहा ने महात्मा गांधी के गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 के जन्म से लेकर उनके 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने तक का वर्णन किया है। गुहा ने लिखा है कि गांधी के विचार मूलत: उनके वर्ष 1915 में भारत लौटने से पहले ही रुप ले चुके थे। इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान उन्होंने साम्राज्यवाद और नस्लवाद की प्रकृति समझी थी।

अपने पुस्तक का विमोचन के दौरान गुहा ने कहा, ‘गांधी को पूरी तरह से समझने के लिए उन्हें हर दृष्टिकोण से देखने की जरूरत हैं। उन्हें केवल उनके, उनके दोस्तों और अनुयायियों के नज़रिए से ही नहीं अपितु उनके दुश्मनों और विरोधियों के नज़रिए से भी देखने की जरूरत है।’ गुहा ने अपनी किताब में मोहनदास कर्मचंद गांधी को बनाने में दक्षिण अफ्रीका की महत्ता को पहचाना है।

गुहा ने कहा, ‘यही दक्षिण अफ्रीका वह जगह थी जहां गांधी सच्चे भारतीय बने। गांधी यहीं महिलाओं और पुरषों के समान अधिकारों के प्रति अधिक संवेदनशील बने, यहीं वह एक प्रारंभिक पर्यावरणविद् बने, यहीं वह विचारक बने और ‘सत्याग्रह’ करने वाले बने और यहीं उन्होंने दुर्लभ नैतिक साहस हासिल किया।

गुहा कहते हैं कि लंदन के छात्र जीवन में गांधी ने समाजसेवा या राजनीति के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। लंदन से लौटने पर गांधी अंग्रेजों से काफी प्रभावित थे। वे काले रंग के गोरे साहब ही थे।

रामचंद्र गुहा के अनुसार वर्ष 1893 में जब मोहनदास गांधी दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हुए तो वह 23 वर्षीय एक ऐसे वकील थे जिन्हें भारत में कोई काम नहीं मिला था जिसके चलते वह भारत में स्वयं को स्थापित नहीं कर पाये थे। दरअसल, लंदन से लौटकर मोहनदास ने हिंदुस्तान में वकालत जमाने की कोशिश की। पहले बंबई हाईकोर्ट में और फिर राजकोट में। लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगी। ऐसा नहीं कि उन्होंने कोशिश नहीं की लेकिन वकालत के दांवपेंच उनसे सध नहीं रहे थे। लेकिन दो साल बाद गांधी को उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी। दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले एक गुजराती व्यापारी अब्दुल्ला सेठ ने उन्हें एक मामले में अपना वकील बना लिया। गांधी वकील एग्रीमेंट यानी गिरमिटिया वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीका गए। एग्रीमेंट पर दक्षिण अफ्रीका जाने वाले मजदूरों को गिरमिटिया कहा जाता था।

गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में दो दशक बिताये। मैरित्सबर्ग स्टेशन पर ट्रेन से बाहर फेंके जाने के बाद कड़कड़ाती ठंड वाली उस अंधेरी रात में गांधी ने पहली बार प्रवासी भारतीयों के अपमानजनक जीवन पर गंभीरता से विचार किया। उन्होंने जाति और धर्म का भेदभाव भूलकर भारतीयों को संगठित होने का मंत्र दिया। जल्दी ही वे प्रवासियों में लोकप्रिय हो गए।

गांधी ने अफ्रीका में पहला राजनीतिक संगठन बनाया। गांधी के प्रयासों से ये संगठन प्रवासी भारतीयों की आवाज बन गया था। गांधी ने समझ लिया था कि इस विशाल ब्रिटिश साम्राज्य से टकराने का तरीका सिर्फ अहिंसक ही हो सकता है। दक्षिण अफ्रीका ने गांधी को बदलकर महात्मा बना दिया था। इस महात्मा ने उस दूर देश में साबित कर दिया था कि भारतीय एकजुट होकर ब्रिटिश सरकार का विरोध कर सकते हैं। आखिरकार महात्मा गांधी 18 जुलाई 1914 को भारत के लिए वापस चल पड़े, जहां एक नया मोर्चा उनका इंतजार कर रहा था।


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