बुरहान वानी तो बहाना है
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बुरहान वानी तो बहाना है
   रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
बुरहान वानी तो बहाना है
कश्मीर घाटी में हालात सामान्य हों, इसकी हर मुमकिन कोशिश हो रही है। लेकिन, मौके की ताक में बैठे लोग आंगड़ी की आंच को हद तक बढ़ाने की सफल हो रहे हैं।
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श्रीनगर/दिल्ली | कश्मीर घाटी में हालात सामान्य हों, इसकी हर मुमकिन कोशिश हो रही है। लेकिन, मौके की ताक में बैठे लोग आंगड़ी की आंच को हद तक बढ़ाने की सफल हो रहे हैं।
कश्मीर घाटी में जो कुछ हो रहा है, वह अचानक हुआ मसला नहीं लगता है। पुराने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि बुरहान की मौत का इंतजार हो रहा था।- जवाहरलाल कौल

जिन अलगाववादियों का प्रभाव वादी में तेजी से घटना था, उनके बंद का गहरा असर अब भी दिख रहा है। बुरहान वानी की मौत ने उन्हें संजीवनी दे दी है।

हालांकि, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह श्रीनगर पहुंचकर पाकिस्तान को सधे शब्दों में हिदायत दी है। वहीं जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मफ्ती पीड़ितों से मिलकर उनका दुख साझा कर रही हैं। कई ऐसे बुद्धिजीवी भी हैं, जो अविश्वास और कटुता से भरे इस माहौल को सामान्य बनाने पर गंभीर विचार कर रहे हैं।

यकीनन, इन कोशिशों का असर होगा। देर-सबेर कश्मीर घाटी के हालात सामान्य हो जाएंगे। लेकिन एक सवाल लोगों को मथता रहेगा कि क्यों घाटी के हालात रह-रहकर बेकाबू हो जाते हैं? क्या पाकिस्तान एक मात्र वजह है? जैसा की देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों से मालूम होता है।

पिछले आठ जुलाई की देर शाम से हिंसा का जो दौर शुरू हुआ है, उसमें करीब 50 लोगों की मौत हो चुकी है। जख्मी होने वालों की संख्या 5,000 से भी अधिक है।

दरअसल, ‘बुरहान वानी मारा गया।’ यह खबर जैसे ही कश्मीर घाटी में फैली तो एक के बाद एक हिंसक प्रतिक्रियाएं होने लगीं। इन प्रतिक्रियाओं ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह कहा जा रहा है कि “हिज्बुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान मुजफ्फर वानी के साथ वही हुआ, जो होना था।

इस सच को वे लोग जानते थे, जिनकी मनसा घाटी में हालात बिगाड़ने की थी। उन लोगों ने बुरहान की मौत का फायदा उठाने के लिए बड़ी साजिश रच रखी थी। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां उनकी इस चाल को समझने में विफल रही।”

सुरक्षा विशेषज्ञों की राय है कि घाटी में भारत विरोधी माहौल को एक रणनीति के तहत उभारा गया है। अब उसे बरकरार रखने की भरपूर कोशिश हो रही है। इसके लिए नए तौर-तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो भावुकता और स्थानीयता का रंग लिए हुए है।

आठ जुलाई को देर शाम अफवाह फैलाई गई कि बुरहान को जहर दे दिया गया है। उस शाम एक युवक शोर मचाता हुआ गली की तरफ भागा- ‘फारुख अहमद वानी ने बुरहान को जहर दे दिया है।’ इतना कहते हुए वह पत्थर लेकर गली के बीचों-बीच खड़ा हो गया। तभी दूसरे ने दावा किया- ‘फारुख के घर की दीवारें खून से रंगी हैं।’ इस तरह कोकरनाग स्थित बामडूरा गांव से अफवाहें एक-एक कर उड़ने लगीं।

घाटी में लोग सड़कों पर आने लगे। तब तक शाम ढल चुकी थी और अंधेरा हो चला था। हल्की रोशनी में पुलिस-जीप बुरहान के शव को लेने बामडूरा पहुंची। तब पुलिस बल ने सख्ती दिखाई। उसने फारुख अहमत के घर को तहस-नहस कर दिया और खुर्रम मीर के बागान को पूरी तरह उजाड़ दिया। पूरी घटना से गांव का माहौल तनावपूर्ण था और लोग सकते में थे।

सूत्र बताते है कि आठ जुलाई को बुरहान वानी सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर नहीं था। एक गुप्त सूचना के आधार पर सुरक्षा एजेंसियां बुरहान के मजबूत नेटवर्क को समाप्त करने के इरादे से बामडूरा पहुंची थी। वह बुरहान के करीबी सहयोगियों को पकड़ने को तत्पर थी, ताकि बुरहान के आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त किया जा सके। इसमें सरताज अहमद शेख का नाम सबसे ऊपर था। वह मोस्ट वांटेड आतंकवादियों की सूची में शामिल था। जब पूरे दल-बल के साथ सेना के जवान बामडूरा पहुंचे तो बुरहान वानी उनके हाथ आ गया। इस खुशी को सुरक्षा एजेंसियां दबा नहीं पाईं।

दरअसल, जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) को आठ जुलाई की सुबह रेडियो फ्रिक्वेंसी पर एक महत्वपूर्ण सूचना हाथ लगी थी, जिसमें फारुख अहमद वानी अपने किसी परिचित से ईद के मौके पर घऱ में विशेष अतिथि के होने की बात कर रहा था। फारुख अहमद रिश्ते में सरताज अहमद शेख का मामा है।

सरताज को पकड़ने के लिए सुरक्षा एजेंसियां पहले भी दो बार फारुख के घर छापामारी कर चुकी थी। यह तीसरा मौका था। सुरक्षा एजेंसियां किसी भी कीमत पर इस अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाह रही थी। पक्की सूचना मिलते ही सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हो गईं।

श्रीनगर से एसओजी की एक विशेष टीम अनंतनाग जिले के कोकरनाग के लिए रवाना हो गई। अनंतनाग में तैनात ‘19 राष्ट्रीय राइफल’ से तत्काल ऑपरेशन के लिए संपर्क किया गया। पूरी तैयारी के साथ सुरक्षाकर्मियों ने शाम को ऑपरेशन शुरू किया।

सुरक्षा मामलों के जानकार प्रवीण स्वामी बताते हैं, “ऑपरेशन के दौरान शायद बुरहान को कवर फायर देने के लिए सरताज अहमद गोलियों की बौछार करता हुआ बाहर आया, जबकि बुरहान पीछे के रास्ते से भागने की कोशिश की, जहां वह मारा गया।”

उन्होंने यह भी जानकारी दी है कि एक समय सरताज खुद बुरहान की खबरें सुरक्षा एजेंसियों को दिया करता था। दिलचस्प बात यह है कि आठ जुलाई को वह बुरहान को कवर फायर देता देखा गया। बुरहान के पास से बरामद मोबाइल फोन की जांच से पता चला है कि मुठभेड़ से कुछ घंटे पहले उसने सरताज अहमद को आखिरी कॉल किया था। वह कॉल उसने उन्हीं 500 सिम में किसी एक से किया था, जिसे उसने अपने लोगों के बीच बांट रखा था।

उस शाम मुठभेड़ में सुरक्षा एजेंसियों को अप्रत्याशित सफलता मिली। कश्मीर का हिज्बुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी के साथ-साथ सरताज अहमद शेख और परवेज अहमद लश्करी मारा गया। लेकिन, इस घटना के बाद कश्मीर घाटी में जिस तरह की हिंसा फैली है, वह अविश्वसनिय है। इसके बाद कई सवाल उठ खड़े हुए हैं।

इस संबंध में आईडीएसए की सीनियर रिसर्च फेलो प्रभा राव कहती हैं, “इन दिनों घाटी में जो कुछ हो रहा है, वह परंपरागत हिंसा से बिल्कुल अलग है। इस घटना से सबक सीखने की जरूरत है।” वे आगे कहती हैं, “बुरहान ने आतंकवाद के परंपरागत रास्ते को छोड़कर एक नया तरीका चुना था। वह था- सोशल मीडिया की खूबियों का प्रयोग। इससे उसने कश्मीर में आतंकवाद के चेहरे को जनमानस के बीच एक समर्थन के रूप में बदल दिया। ठीक उसी तरह जैसा कि ‘अरब स्प्रिंग’ और ‘सीरिया में आईएसडीएस’ ने किया था।”

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बुरहान की गतिविधियों का विश्लेषण करते हुए प्रभा राव ने जानकारी दी है, “जिहाद में दाखिल होने की उसकी पुकार में कुरान के अंश होते थे। इसके साथ-साथ ‘आजादी’ की भावुक मांग होती थी। उसके पोस्ट मोदी विरोधी तथ्य वाले होते थे। वह ऐसी तस्वीरें पोस्ट करता था जो अन्य युवकों के मन में आतंक के प्रति एक पहचान और क्षति-रहित पेशे के साथ-साथ नायक होने के भाव को जगाता था।” वह अपनी गतिविधियों से आतंकवाद के नए दौर को स्थापित करने की कोशिश कर रहा था।

कश्मीर घाटी की आबादी का साठ प्रतिशत भाग 30 साल से कम के युवकों की है। उनमें अधिकतर बेरोजगार हैं, लेकिन वे सोशल मीडिया पर अति सक्रिय हैं। बुरहान का लक्ष्य इनके बीच लोकप्रिय होना था। विशेषज्ञों की राय है कि उसे ‘पोस्टर ब्यॉय’ का तमगा देकर मीडिया भी चाहे-अनचाहे उसकी सहायता कर रहा था।

हालांकि, श्रीनगर के बुद्धिजीवियों की राय इससे अलग है। नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार कहती हैं, “यह सच है कि बुरहान सोशल नेटवर्किंग साइटों पर सक्रिया था। इसके बावजूद वह घाटी के सभी युवकों का हीरो नहीं था, लेकिन फौज की एक गलत रणनीति ने उसे कश्मीर घाटी का हीरो बना दिया।”

एक सवाल के जवाब में श्रीनगर के मुश्ताक सिकंदर कहते हैं, “यहां लोगों के पास खुद को अभिव्यक्त करने का कोई अवसर नहीं है। उनमें गुस्सा है, लेकिन वे जाहिर नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में जब कभी मौका मिलता है, तो वे दोगुनी ताकत से उसका इजहार करते हैं। आज कश्मीर घाटी में यही स्थिति है।”

वहीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बुरहान की गतिविधियों के मद्देनजर वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कौल कहते हैं, “कश्मीर घाटी में जो कुछ हो रहा है, वह अचानक हुआ मसला नहीं लगता है। पुराने अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि बुरहान की मौत का इंतजार हो रहा था।”

वे आगे कहते हैं, “21 मई,1990 को मौलवी मोहम्मद फारूक की हत्या ज्यों हुई, 10 मिनट के भीतर श्रीनगर जलने लगा। मेरा मानना है कि मौलवी फारुख की हत्या पहले से तय थी। उसका क्या फायदा उठाना है? यह भी तय था, इसलिए उसकी भी तैयारी कर ली गई थी।”

जानकारों की माने तो पाकिस्तान नई रणनीति के तहत कश्मीर में अलगाववादी संगठनों को मजबूत करने में जुटा है। बुरहान की मौत के बाद भड़की हिंसा को पाकिस्तानी मीडिया हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। इस घटना को उसने यह संदेश देने का जरिया बनाया है कि कश्मीरी समर्थक पाकिस्तान के साथ हैं।

खैर, बुरहान वानी को आगे कर वर्चुअल दुनिया में स्थानीय आतंकवाद का बीज बोया जा रहा था। नौजवानों को आकर्षित कर इसे मजबूत करने की साजिश रची जा रही थी। इसमें काफी हद तक षड्यंत्रकारी कामयाब रहे हैं। एक उदाहरण से यह बात सामने आती है।

घाटी में पहली बार पुलिसकर्मियों के परिवार को निशाने पर लिया गया। अनंतनाग जिले के बिजबेहरा स्थित संगम पुलिस पोस्ट पर तैनात पुलिस अधिकारी मोहम्मद असरफ पाल की पत्नी और बेटी पर भीड़ ने 13 जुलाई को हमला कर दिया। घाटी में अपने तरह की यह पहली घटना है।

वहीं 15 साल बाद एक बार फिर स्थानीय कश्मीरी युवक की जमात पाकिस्तानी आतंकवादियों से ज्यादा हो गई है। उत्तरी कश्मीर में 66 स्थानीय और 44 विदेशी आतंकवादी हैं, जबकि दक्षिणी कश्मीर में 109 स्थानीय और सात विदेशी आतंकवादी सक्रिय हैं।

ऐसी परिस्थिति में यह देखना है कि भारत अपने अविभाज्य अंग कश्मीर घाटी में हो रहे भावुक विरोध को कैसे रोकता है? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगर हिंसा थम जाती है, तब भी अविश्वास और कटुता का जो भाव दोनों तरफ गहराया है, उसे सामान्य होने में वक्त लगेगा।


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उदाहरण पेश करता संघर्ष
मारुति सुजूकी के मजदूरों ने बहुत बहादुरी से दमनकारी प्रबंधन और मिलीभगत वाली सरकार का सामना किया। इस संघर्ष ने एक उदाहरण पेश किया है।
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