आधी रात का सपना
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आधी रात का सपना
आधी रात को हिन्दुस्तान के लोग सपने में क्या देखें, इसका प्रबंध क्या कोई कर सकता है?' इस सवाल को 1987 में राजेन्द्र माथुर ने उठाया था। वे अपने समय के शिखर पत्रकार थे। आज उसका जवाब मिल गया है।
नई दि्ल्ली  | आधी रात को हिन्दुस्तान के लोग सपने में क्या देखें, इसका प्रबंध क्या कोई कर सकता है?' इस सवाल को 1987 में राजेन्द्र माथुर ने उठाया था। वे अपने समय के शिखर पत्रकार थे। आज उसका जवाब मिल गया है।
नोटबंदी पर पहली प्रतिक्रिया स्वागत और सराहना की है। सिर्फ दो अपवाद हैं। पहली ममता बनर्जी और दूसरे अरविंद केजरीवाल। लोगों ने इन्हें अपने चित्त से उतार दिया है। इन्हें खारिज कर दिया है। मान लिया गया है कि ये दोनों थेथरई कर रहे हैं, क्योंकि इनकी राजनीति कालेधन पर टिकी है। ये दोनों साफ-सुथरी राजनीति के वादे से सत्ता में आए थे। इनके अलावा किसी भी राजनीतिक नेता ने नोटबंदी का सैद्धांतिक विरोध नहीं किया है।

नोटबंदी का फैसला यह सुनिश्चित करने के लिए काफी है कि लोग सपने में क्या देखें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार, कालेधन का खात्मा, जाली नोटों के कारोबार से बढ़ते आतंकवाद और अलगाववाद को निशाने पर लिया है। इसके लिए नोटबंदी का तीर काफी है। बिहारी ने सतसई में ऐसे ही फैसले के लिए लिखा है- 'देखन में छोटन लगे, घाव करे गंभीर।'

इस फैसले पर पहली प्रतिक्रिया स्वागत और सराहना की है। सिर्फ दो अपवाद हैं। पहली ममता बनर्जी और दूसरे अरविंद केजरीवाल। लोगों ने इन्हें अपने चित्त से उतार दिया है। इन्हें खारिज कर दिया है। मान लिया गया है कि ये दोनों थेथरई कर रहे हैं, क्योंकि इनकी राजनीति कालेधन पर टिकी है। ये दोनों साफ-सुथरी राजनीति के वादे से सत्ता में आए थे। इनके अलावा किसी भी राजनीतिक नेता ने नोटबंदी का सैद्धांतिक विरोध नहीं किया है। जो भी विरोध और आलोचना के बोल हैं वे व्यावहारिक कारणों से हैं। लोगों को परेशानी होगी और नतीजा कुछ नहीं निकलेगा, यही विरोध करने वालों के तर्क हैं। इसमें आधी सचाई तो है ही। जो इस फैसले के समर्थन में हैं वे भी अनुभव कर रहे हैं कि परेशानी हो रही है। क्या इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नहीं जानते? अवश्य जानते हैं। इसे उन्होंने अपने पहले भाषण में ही बताया था और कहा था कि 50 दिन की परेशानी के लिए तैयार रहिए।

जाहिर है कि 8 नवंबर की आधी रात से सारा देश एक ही सपना देख रहा है। कुछ लोगों की नींद बार-बार उस सपने से टूट रही है। वे सदमे में हैं। उसे बताने की जरूरत नहीं है। सभी जानते हैं। यही कुछ लोग हैं जो कालेधन और नकली नोट से अर्थव्यवस्था को चौपट किए जा रहे थे। जिससे साधारण नागरिक बेबस होकर देख रहा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस बेबसी को तोड़ दिया है। इसीलिए उनके प्रति सराहना का भाव गहरे रूप में लोगों के मन में बैठा हुआ है। अगर ऐसा न होता तो विपक्ष ने जितना उकसाया उससे देश में विद्रोह की आंधी खड़ी हो सकती थी।

नोटबंदी की मार दोहरी है। वे भी इसके दायरे में आ गए हैं जो कहीं से भी दोषी न माने जा सकते हैं, न ठहराए जा सकते हैं। इसे मनमोहन सिंह जैसा अनुभवी अर्थशास्त्री भी समझ नहीं पा रहा है। जब मनमोहन सिंह का यह हाल है तो दूसरे अर्थशास्त्रियों के बारे में सोचना ही व्यर्थ है। मनमोहन सिंह ने जिस शब्द का उपयोग किया वह वास्तव में क्या है? ज्यादातर अखबारों ने उसे 'लूट-खसोट का राज' कहा, जबकि पी. चिदंबरम ने उसे 'बड़े पैमाने पर बदइंतजामी' शब्द बताया। इसे ही सही मानना चाहिए।

यह शब्द उस दृश्य को अपने में समेटता है जो नोटबंदी के बाद दिखाई पड़ रहा है। यह ऐसी आलोचना है जिसमें सच को खोजने के लिए एक सम्यक दृष्टि चाहिए। इसे एक उदाहरण से समझना आसान होगा। एक जगह कुंआ खोदा जा रहा है। पथरीला स्थान है। नीचे चट्टाने हैं। उन्हें तोड़ना है। पहुंचना है पाताल तक, जिससे निर्मल जल पाया जा सके। इसके लिए मशीन जो लगेगी वह पहले मिट्टी, फिर बालू और चट्टानों को तोड़ेगी। जो इसे देखेगा वह 'विशाल बदइंतजामी' के दृश्य का साक्षी होगा। अगर उसमें वह दृष्टि न हो और केवल उसी नजारे को देखकर नतीजा निकाल ले तो वह गलत नतीजे पर पहुंचेगा। लेकिन थोड़ा धैर्य रखें और सोचें कि जिस दिन पाताल से पानी खोजा जा सकेगा उस दिन वह कुंआ जीवनदायी माना जाएगा।

इसका ही आश्वासन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दे रहे हैं। उनके इरादे पर किसी को संदेह नहीं है। उन्होंने अब तक के सारे प्रयासों से अलग एक छलांग लगाई है। पहले के प्रयास सीढ़ी दर सीढ़ी उतरकर कालेधन को खोजने के थे। इस बार का प्रयास हर मायने में भिन्न और श्रेष्ठ है। मुरादाबाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन सवालों के जवाब दिए जो उठाए जा रहे हैं। यह भरोसा दिलाया कि यह आखिरी लाइन होगी। भविष्य में लोगों को बैंकों के सामने लाइन नहीं लगानी पड़ेगी। इसी उम्मीद से लोग अपनी परेशानी को असहनीय कष्ट नहीं मान रहे हैं। उन्होंने कहा कि 'मैंने 50 दिन मांगे हैं। मुसीबत धीरे-धीरे कम हो रही है।'

नोटबंदी का यह पहला चरण है। यह एक समय की घटना मात्र नहीं है। यह एक प्रक्रिया है। जिसे कई चरणों में पूरा होना है। पहले चरण में लोग इस फैसले पर अहोभाव से अभिभूत हैं। लेकिन दूसरे चरण में क्या होगा? इस पर अपनी-अपनी अटकलें हैं। इसमें साधारण नागरिक से विशेषज्ञ तक सभी शामिल हैं। अनेक अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया है कि दूसरा चरण मंदी का होगा। अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी। उससे बेरोजगारी फैलेगी। इस आशंका को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुरादाबाद में जो कहा वह पत्थर की लकीर बन सकती है। उन्होंने कहा कि 'देश में ऐसी हवा बन गई थी कि सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। नेताओं की जेब भर दो, काम हो जाएगा। लेकिन अब यह नहीं चलेगा।'

किसी प्रधानमंत्री ने ऐसी घोषणा कभी नहीं की। भ्रष्टाचार का मुद्दा नया नहीं, बहुत पुराना है। 1962 के पटना कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू के सामने ही अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी ने उसे पहली बार उठाया। लेकिन भ्रष्टाचार को राजनीतिक मुद्दा विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बनाया। तब से यह अभियान और आंदोलन का विषय बना हुआ है। जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जन आकांक्षा से जोड़ दिया है। यही इसका राजनीतिक पहलू भी है जिसमें झांकने की कोशिश की जा रही है। इसके अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इसका राजनीतिक नफा-नुकसान क्या होगा। हाल में जो उप-चुनाव और अन्य चुनाव हुए हैं, वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में भरोसे का प्रमाण देते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का यह आलेख यथावत पत्रिका से साभार है।)


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