पराठे वाली गली का मजा लीजिए
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पराठे वाली गली का मजा लीजिए
   बुधवार | दिसंबर १३, २०१७ तक के समाचार
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नई दिल्ली  | दिल्ली का मुगलकालीन बाजार- चांदनी चौक। यह इलाका चंद पेचिदां गलियों से घिरा एक घना बाजार है। यहां एक पराठे-वाली गली है। जो इस गली में आता है, उसका मुरीद बनकर ही लौटता है।
दिल्ली का मुगलकालीन बाजार- चांदनी चौक। यह इलाका चंद पेचिदां गलियों से घिरा एक घना बाजार है। यहां एक पराठे-वाली गली है। जो इस गली में आता है, उसका मुरीद बनकर ही लौटता है।
नए उग आए बाजारों में बड़े-बड़े रेस्तरां के मुकाबले चांदनी चौक की पराठे-वाली गली का मान है। इसकी एक ही वजह है। वह यह कि आधुनिकता से लबरेज माहौल में भी यह गली खांटी देशीपन का आभास कराती है।

पुराने लोग बताते हैं कि समय के साथ इलाके ने ऐसा आकार ग्रहण कर लिया है। सन् 1646 में मुगल बादशाह शाहजहां अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लेकर आए तो कुछ ऐसे लोग भी आए, जिनसे चांदनी चौक आबाद हुआ।

स्थानीय लोगों के मुताबिक पराठे-वाली गली के नाम से मशहूर इस गली का वजूद भी उसी समय आ गया था। पर, उन दिनों भी यह गली पराठे-वाली गली के नाम से पहचानी जाती थी,इसका कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं है।

गली के दूसरे मोड़ पर करीब 140 वर्ष पुरानी पीटी गयाप्रसाद शिवचरण नाम की दुकान है। दुकान पर बैठे मनीष शर्मा बताते हैं-  हमारे पुरखे आगरा के रहने वाले थे। उन्होंने 1872 में इस दुकान को खोला था।

बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि उनकी दुकान में पराठा बनाने वाले भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह काम कर रहे हैं। इनके पुरखे भी मनीष के पुरखे के साथ काम किया करते थे। इनका वर्षों का नाता है।

इसके बाजू वाली परांठे की दुकान 1876-77 की है। दुकान से बाहर परांठे का स्वाद लेने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही विद्या ने बताया-  मैं अपनी बहन की शादी की मार्केटिंक करने मॉडल टाउन से यहां आई हूं। जब भी चांदनी चौक आने का मौका मिलता है तो पराठे-वाली गली जरूर आती हूं।

भीड़-भाड़ वाली इस गली में बहुत मुमकिन है कि आप बिना कंधे से कंधा टकराए एकाधा गज की दूरी तय कर सकें। इसके बावजूद पराठे-वाली गली से यहां आने वालों के जो पुराने ताल्लुकात कायम हुए थे, वो बने हुए हैं।

मनीष बताते हैं- कई ऐसे लोग हैं जो पहले अपने पिताजी के साथ यहां पराठा खाने आते थे। अब अपने बच्चों को लेकर पराठा खाने आते हैं।

आज नए उग आए बाजारों में बड़े-बड़े रेस्तरां के मुकाबले चांदनी चौक की पराठे-वाली गली का मान है। इसकी एक ही वजह है। वह यह कि आधुनिकता से लबरेज माहौल में भी यह गली खांटी देशीपन का आभास कराती है। साथ ही देशी ठाठ वाले जायकेदार व्यंजनों का लुत्फ उठाने का भरपूर अवसर देती है। शायद इसलिए लोग समय निकालकर यहां आते हैं।


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