गंगा बचेगी तो हम बचेंगे
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गंगा बचेगी तो हम बचेंगे
   रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
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गंगा बचेगी तो हम बचेंगे
गंगा नदी की समस्याएं अनगिनत हैं। लेकिन, उन सभी के मूल में मनुष्य है, जिसका उद्धार करने के लिए वह पृथ्वी पर अवतरित हुई थी।
नयी दिल्ली | गंगा नदी की समस्याएं अनगिनत हैं। लेकिन, उन सभी के मूल में मनुष्य है, जिसका उद्धार करने के लिए वह पृथ्वी पर अवतरित हुई थी।
हरिद्वार में आने से पहले जिन 27 प्रमुख नदियों से गंगा को पानी मिलता था, उनमें से 11 नदियां तो धरा से ही विलुप्त हो चुकी हैं और पांच सूख गई हैं। ग्यारह के जलस्तर में भी काफी कमी हो गई है।

उसी मनुष्य ने पिछले दो सौ वर्षों से अपनी तथाकथित तरक्की के लिए जो उपभोगवादी रास्ता चुना है, वह अभी तो बहुत हरा-भरा और लुभावना दिख रहा है, लेकिन अंततः वह उस रेगिस्तान की ओर जाता हैजहां विनाश के सिवाय कुछ भी नहीं है।

भारत के पौराणिक साहित्य से लेकर यहां की लोक-कथाओं तक ऐसे कई प्रसंग मिल जाएंगे, जिसमें गंगा की अविरल धारा को उसी तरह त्रिकाल सत्य माना गया है, जैसे सूर्य और चंद्रमा को। लोग गंगा की धारा को अटूट सत्य मानकर कसमें खाते थे, आशीर्वाद देते थे। विवाह के समय मांगलिक गीतों में गाया जाता था।क्या आज इस गीत का कोई औचित्य रह गया है?

अतीत का विश्वास आज टूट चुका है। गंगा की अविरल धारा खंडित हो चुकी है। भागीरथी, धौलीगंगा, ऋषिगंगा, बाणगंगा, भिलंगना, टोंस, नंदाकिनी, मंदाकिनी, अलकनंदा, केदारगंगा, दुग्धगंगा, हेमगंगा, हनुमानगंगा, कंचनगंगा, धेनुगंगा आदि वो नदियां हैं, जो गंगा की मूल धारा को जल देती हैं या देती थीं। हरिद्वार में आने से पहले जिन 27 प्रमुख नदियों से गंगा को पानी मिलता था, उनमें से 11 नदियां तो धरा से ही विलुप्त हो चुकी हैं और पांच सूख गई हैं। ग्यारह के जलस्तर में भी काफी कमी हो गई है।

युगों-युगों से भारत की सभ्यता और संस्कृति की प्रतीक रही गंगा भविष्य में भी बहती रहेगी, या घोर कलियुग के आगमन का संकेत देते हुए विलुप्त हो जाएगी, इस बारे में अभी कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन इस समय जो परिस्थितियां बन रही हैं, उसे देखते हुए संतोष व्यक्त नहीं किया जा सकता। गंगा की समस्याएं अनगिनत हैं लेकिन उन सभी के मूल में मनुष्य है, जिसका उद्धार करने के लिए वह पृथ्वी पर अवतरित हुई थी। मनुष्य ने पिछले दो सौ वर्षों से अपनी तथाकथित तरक्की के लिए जो उपभोगवादी रास्ता चुना है, वह अभी तो बहुत हरा-भरा और लुभावना दिख रहा है, लेकिन अंततः वह उस रेगिस्तान की ओर जाता है, जहां विनाश के सिवाय कुछ भी नहीं है।

गंगा नदी भारत के बहुत बड़े भूभाग का हजारों वर्षों से पालन-पोषण करती आ रही है। हमारे पूर्वजों ने गंगाजल को इस तरह इस्तेमाल किया कि गंगा के अस्तित्व पर कभी कोई संकट नहीं आया। लेकिन आज गंगाजल के संयमित उपभोग की बजाए उसके दोहन और शोषण पर जोर है। इसके चलते जो समस्याएं पैदा हुई हैं, या होने वाली हैं, उनके गंभीर परिणाम होने वाले हैं।

सुरंगों और बांधों का दुष्चक्र
भारत में औद्योगिक विकास को तेज करने के लिए बिजली की जरूरत महसूस हुई। इसके लिए जल विद्युत परियोजनाओं की बाढ़ सी आ गई। पहाड़ों से निकलने वाली नदियों के पानी को बांध बनाकर रोका गया, ताकि एकत्रित पानी को तंग सुरंगों से गुजारते हुए इस प्रकार गिराया जा सके कि उससे टरबाइन चले और बिजली बने। जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली को प्रदूषण मुक्त बिजली कहकर सराहा गया। इसे सस्ती भी बताया गया। लेकिन सच्चाई इससे अलग है।बांध परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने से हिमालय का नाजुक पर्यावरण प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कागजों में जितनी सतर्कता की बात की जाती है, धरातल पर उसका शतांश भी नहीं होता है।

हिमालय की गोद से निकलने के कारण गंगा प्रतिवर्ष हिमालय से 36 करोड़ टन उर्वर मिट्टी ले आती है। इसी मिट्टी से भारत का सबसे उपजाऊ गंगा-यमुना का दोआबा बना है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। बांध बन जाने केकारण गंगा की उर्वर गाद मैदानों में नहीं आ पाएगी। यह गाद बांधों की तली में जमा होती जाएगी। परिणाम स्वरूप बांधों की जलग्रहण क्षमता कम होती जाएगी और कुछ दशकों में ही उनकी बिजली उत्पादन क्षमता समाप्त प्राय हो जाएगी। साथ ही उपजाऊ मिट्टी मैदानों में न आने के कारण खाद्यान्न उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ेगा।

मसलन ऐसी कई प्राकृतिक समस्याएं हैं, जिसपर नकारात्मक असर पड़ेगा। बांधों में जल की उपलब्धता घटने के साथ ही दूसरी समस्या यह है कि पीछे ग्लेसियर सिकुड़ रहे हैं। इस कारण पानी की उपलब्धता घटेगी। इनका असर जल विद्युत परियोजनाओं पर भी दिखेगा। वहीं पहाड़ों का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। इससे बाढ़, भूजल में कमी, भूस्खलन और भूकंप के खतरे बढ़ रहे हैं। प्रवाह के अभाव में भूमिगत पुनर्भरण (रिचार्ज) की प्रक्रिया ठप्प हो जाती है। ऐसी हजारों समस्याएं हैं, जो एकाएक खड़ी हो सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी नदी में जितना जल प्रवाहित होता है, उसकी 30 प्रतिशति से अधिक निकासी नदी के स्वास्थ्य के लिए घातक है। यदि हम अक्षय विकास चाहते हैं तो हमें यह बात ध्यान में रखनी होगी। हमें अपने विकास को इस प्रकार नियोजित करना होगा कि प्रवाह के तीस प्रतिशत से ही हमारा गुजारा हो जाए।

शहरी प्रदूषण
यह एक अलग और बड़ी समस्या है। आजकल हम उस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं, जहां नदियों को नाले के रूप में इस्तेमाल किया जाना तय है। साधारण शब्दों में कहें तो सरकार की जलनीति यही है कि नदियों का अधिक से अधिक प्राकृतिक जल निकाल कर मानव उपभोग के लिए इस्तेमाल हो।और सीवर के रूप में जो जल निकलता है, उसे नदियों के माध्यम से समुद्र तक ले जाने की व्यवस्था की जाए।

1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान के माध्यम से गंगा को साफ करने की बात चलाई थी। आज उस बात को 25 साल से अधिक हो गए हैं। इस दौरान हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन गंगा की हालत बद से बदतर होती गई है।

समाधान
गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए कई स्तरों पर कार्य करना होगा। लेकिन सबसे जरूरी है कि गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित किया जाए। इसके बिना सारे उपाय निरर्थक साबित होंगे। स्वस्थ नदी के रूप में गंगा का हमारे बीच रहना जरूरी है। गंगा बचेगी, तो हम बचेंगे। गंगा रक्षा के वास्तविक उपाय करने के लिए हमारी जीवनदृष्टि में बदलाव जरूरी है। उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए। लेकिन तात्कालिक रूप से कुछ कदम अविलंब उठाए जाने चाहिए। जैसे- बाढ़ के समय गंगा नदी का जो वृहत्तर तट क्षेत्र होता है, उसके दोनों ओर के 500 मीटर के दायरे की पैमाइश हो और उसे सरकारी रेकार्ड में गंगाजी की जमीन के तौर पर दर्ज किया जाए। साथ ही इस जमीन पर अतिक्रमण रोकने के लिए आवश्यक इंतजाम तुरंत किए जाने चाहिए।

यह बात सच है कि गंगा सामान्य नदी नहीं है। इसलिए उसके संरक्षण के विशेष उपाय होने चाहिए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम दूसरी नदियों को नष्ट-भ्रष्ट करते चलें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि गंगा ही नहीं, बल्कि सभी नदियों का बचना जरूरी है। हमारे पुराणों ने ही नहीं, बल्कि अनेक आधुनिक वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि जल में जीवन होता है यानी नदी में जीवंतता होती है। उसकी हिलोरें, उसका विभिन्न स्थानों पर विभिन्न स्वरूप में फैलना, सिकुड़ना, गरजना, शांत बहनाये सभी उसकी जीवंतता के परिचायक हैं। मनुष्य को इस बात का कोई हक नहीं कि वह नदियों का जीवन छीन ले। यदि मनुष्य आज यह अपराध कर रहा है, तो उसे प्रकृति से मिलने वाले दंड के लिए भी तैयार रहना चाहिए।


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