मर्दवादी दुनिया के खिलाफ खड़ी अनारकली
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मर्दवादी दुनिया के खिलाफ खड़ी अनारकली
   रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
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मर्दवादी दुनिया के खिलाफ खड़ी अनारकली
अनारकली को सिर्फ एक नए फिल्मकार की पहली फिल्म के तौर पर देखना इसके कंटेंट का अपमान होगा। किसी भी कहानी की अपनी एक ताकत होती है, जो रचनात्मक प्रतिभा से निखर तो सकती है लेकिन सिर्फ क्रिएटिविटी के दम पर गढ़ी नहीं जा सकती। बिना अनारकली को जाने, बिना आरा को जिये, ऐसी कहानी कह पाना संभव नहीं है।
मुंबई | अनारकली को सिर्फ एक नए फिल्मकार की पहली फिल्म के तौर पर देखना इसके कंटेंट का अपमान होगा। किसी भी कहानी की अपनी एक ताकत होती है, जो रचनात्मक प्रतिभा से निखर तो सकती है लेकिन सिर्फ क्रिएटिविटी के दम पर गढ़ी नहीं जा सकती। बिना अनारकली को जाने, बिना आरा को जिये, ऐसी कहानी कह पाना संभव नहीं है।
चुस्त पटकथा, मीठी बिहारी हिंदी में लिखे गए संवाद, छोटे बड़े सभी कलाकारों के दमदार अभिनय के अलावा फिल्म की एक बहुत बड़ी बात इसका संगीत है। लंबे अरसे बाद कम बजट वाली कोई ऐसी म्यूजिकल फिल्म आई है।

पहली ही फिल्म में अविनाश ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे पार कर पाना उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होगी। स्वरा भास्कर के लिए भी इतना दमदार कैरेक्टर दोबारा ढूंढ़ पाना बहुत मुश्किल होगा।

अनारकली द्विअर्थीय गीत गाने वाली एक औरत की कहानी है, जो मर्दवादी दुनिया के खिलाफ खड़े होकर डंके की चोट पर यह बताती है कि उसकी पहचान चाहे जो भी हो, उसका शरीर और मन अपना है। कोई उसे मजबूर नहीं कर सकता। बेशक स्टोरी की वन लाइनर आपको बहुत मौलिक ना लगे, लेकिन अनारकली से मिलने के बाद आपको लगता है कि वो सिर से पांव तक ऑरिजनल है।

एक ताकतवर, लेकिन सहज कहानी में अनप्रिडिक्टेबिलिटी पैदा करके उसे शुरू से अंत तक दिलचस्प बनाए रखना ही एक फिल्मकार का मूल काम है। अविनाश इस कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरे। इंटरवल के बाद कहानी फंसती नजर आई, लेकिन निर्देशन और एडिटिंग के कौशल ना सिर्फ फिल्म को इससे उबारा, बल्कि एक ऐसी हाई प्वाइंट पर ले जाकर छोड़ा कि आखिरी दृश्य दर्शक कभी भूल नहीं पाएंगे।

चुस्त पटकथा, मीठी बिहारी हिंदी में लिखे गए संवाद, छोटे बड़े सभी कलाकारों के दमदार अभिनय के अलावा फिल्म की एक बहुत बड़ी बात इसका संगीत है। लंबे अरसे बाद कम बजट वाली कोई ऐसी म्यूजिकल फिल्म आई है।

फिल्म का एंटरटेनमेंट वैल्यू और इसके इमोशन एक दूसरे में उलझ सकते थे। लेकिन एक बहुत गंभीर मुद्दे को उठाने के साथ फिल्म लगातार एंटरटेनिंग बनी रही। एक और ख़ास बात, बहुत कम फिल्में ऐसी होंगी, जिनका रीजनल फ्लेवर इतना प्रमाणिक हो।

दर्शक बहुत ज्यादा नहीं थे। लेकिन देखकर समझ में आ रहा था कि ये अच्छा सिनेमा ढूंढ़ने वाले लोग हैं जो वीक-डे में भी फिल्म के बारे में पता करके यहां तक आए हैं। फिल्म खत्म होने पर बजी तालियां बता रही थीं कि अनारकली अपनी कामयाबी की कहानी लिख चुकी है।

निजी तौर पर एक और दिलचस्प अनुभव संजय मिश्रा से हुई नाटकीय मुलाकत रही। बहुत पहले मैंने उनके साथ एक टीवी शो किया था। मैंने मुंबई शिफ्ट होने की सूचना दी थी, लेकिन मुलाकत नहीं हो पाई। इंटरवल में बत्तियां जली तो देखा कि संजय मेरे साथ बैठे फिल्म देख रहे हैं। एक गर्मजोशी भरी एक अप्रत्याशित मुलाकात थी, जिसका क्रेडिट भी अनारकली को ही जाता है।

(यह लेख राकेश कायस्थ के फेसबुक वॉल से साभार है। वे जाने-माने व्यंग्यकार हैं और टेलीविजन की पत्रकारिता में ऊंचा स्थान रखते हैं।)


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