सत्ता के गलियारों में खो गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना
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सत्ता के गलियारों में खो गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना
   गुरुवार | जनवरी १८, २०१८ तक के समाचार
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सत्ता के गलियारों में खो गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना
बदली परिस्थितियों में जयप्रकाश नारायण और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। आज समग्र क्रांति की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस होने लगी है। जिन मुद्दों पर जे.पी. आंदोलन खड़ा था, वे आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
नयी दिल्ली | बदली परिस्थितियों में जयप्रकाश नारायण और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। आज समग्र क्रांति की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस होने लगी है। जिन मुद्दों पर जे.पी. आंदोलन खड़ा था, वे आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
जे.पी. आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, लेकिन जो उस क्रांति के अग्रणी सिपाही थे, उन्होंने इस सपने को पूरा करने की कोई कोशिश नहीं की, उनकी सारी कोशिश सत्ता हासिल करने में लगी रही। सम्पूर्ण क्रांति का सपना भले ही सत्ता के गलियारों में खो गया हो, लेकिन मुद्दा आज भी जीवित है।

जयप्रकाशजी ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा, यह सोचकर दिया था कि व्यवस्था में परिवर्तन हुए बगैर समग्र क्रांति सम्भव नहीं है। लेकिन यह नहीं सोचा था कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए उस आंदोलन में शामिल लोग अपना लक्ष्य सिर्फ सत्ता को ही मान लेंगे।

उस आंदोलन से निकला नेतृत्व कांग्रेस से कहीं ज्यादा भ्रष्ट साबित हुआ है। उनके कामकाज से कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने जयप्रकाशजी के आदर्शों को राजनीतिक जीवन में ढालने का प्रयास किया है। सत्ता की राजनीति का जो ढर्रा तब था अब वह और ज्यादा गिरावट के साथ सामने आ रहा है। जो मुद्दे जयप्रकाश आंदोलन की सम्पूर्ण क्रांति में शामिल थे, उनमें अब और कुछ मुद्दे भी जुड़ गए हैं। भ्रष्टाचार, शिक्षा में परिवर्तन, महंगाई में कमी होना, सामाजिक परिवर्तन के लिए लड़ाई, आर्थिक असमानता को कम करना- इन सब मुद्दों को जयप्रकाशजी ने एक आंदोलन का रूप दिया था- सम्पूर्ण क्रांति के रूप में। उनका मानना था कि सिर्फ सरकार के प्रयत्नों से ये समस्याएं हल नहीं होंगी। व्यवस्था से जुड़े परिवर्तन होना चाहिए। लेकिन आज जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े लोगों ने इन मुद्दों को पूरी तरह भुला दिया है।

आज समग्र क्रांति की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है, क्योंकि पहले इसका संदर्भ सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकार से जुड़ा हुआ था लेकिन अब इसमें वै·श्विक संदर्भ भी जुड़ गया है। वैश्वीकरण के कारण चुनौतियां ज्यादा व्यापक रूप में हमारे सामने हैं। इस वैश्वीकरण के कारण भारत की सम्प्रभुता और आर्थिक स्वायत्तता का सवाल खड़ा हो गया है। विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को मानने के लिए हमारा देश बाध्य हो गया है।

अब चुनौतियां पहले से ज्यादा बढ़ गई हैं, इसलिए जे.पी. आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है, लेकिन जो उस क्रांति के अग्रणी सिपाही थे, उन्होंने इस सपने को पूरा करने की कोई कोशिश नहीं की, उनकी सारी कोशिश सत्ता हासिल करने में लगी रही। सम्पूर्ण क्रांति का सपना भले ही सत्ता के गलियारों में खो गया हो, लेकिन मुद्दा आज भी जीवित है।

सम्पूर्ण क्रांति का सपना

देशभर में जे.पी.आंदोलन अपना असर दिखा रहा था। केन्द्र में सरकार भी बदली। केन्द्र में जनता दल की सरकार आयी। लेकिन जनता सरकार के कामकाज और रवैये से जयप्रकाशजी बहुत निराश थे। यदि वे जीवित रहते तो निश्चित रूप से सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन को जीवित करने की कोशिश करते। अब वे नहीं हैं तो जिन लोगों की जे.पी. में निष्ठा है, उनमें विश्वास है, उन्हें यह काम करना चाहिए। लेकिन आज उस क्रांति के सिपाही कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं। फिलहाल कोई सम्भावना भी नहीं दिखाई देती, क्योंकि उस आंदोलन के लोग तमाम खेमों में बंटे हुए हैं और कोई एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं दिखाई देता जो लोगों को जोड़ सके। नई पीढ़ी में अगर कोई चेतना पैदा हो तो शायद आशा की किरण दिखाई दे।


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