सुरक्षित गर्भपात का अधिकार
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सुरक्षित गर्भपात का अधिकार
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेंसी कानून में लंबे समय से जिन संशोधनों की मांग की जा रही है, उन्हें करने का वक्त अब आ गया है।
नई दि्ल्ली  | मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेंसी कानून में लंबे समय से जिन संशोधनों की मांग की जा रही है, उन्हें करने का वक्त अब आ गया है।
अनुमान है कि भारत में दो-तिहाई गर्भपात असुरक्षित तरीके से बगैर नियंत्रण वाले अनाधिकृत अस्पतालों में होते हैं। इसकी कई वजहें हैं। कहीं लोगों की पहुंच इसकी वजह है तो कहीं अधिकृत डाॅक्टरों द्वारा सेवा देने से इनकार। इसके अलावा इसकी सामाजिक वजहें भी हैं।

हाल के दिनों में सर्वोच्च अदालत में कई ऐसे मामले पहुंचे हैं जिनमें 20 हफ्ते से अधिक के गर्भ का गर्भपात करने की अनुमति मांगी गई। इससे साफ है कि वैध तरीके से गर्भपात करने से संबंधित 1971 के कानून में संशोधन की कितनी जरूरत है।

ये मामले उच्चतम न्यायाल तक इसलिए पहुंच रहे हैं क्योंकि 20 हफ्ते से अधिक का गर्भ होने पर गर्भपात की अनुमति सिर्फ तब है जब मां की जान को खतरा हो। भ्रूण में अगर कोई दिक्कत हो या उसे किसी गंभीर बीमारी का खतरा हो तब भी कानून इसे मां के लिए खतरा नहीं मानता।

कई बार ऐसा होता है कि पेट में पल रहे भ्रूण में गंभीर दिक्कत का अंदाज 20 हफ्ते के बाद ही लगता है। इस स्थिति में गर्भपात के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं और अदालत को डाॅक्टरों की सलाह पर केस के आधार पर निर्णय देना होता है।

इस कानून में प्रस्तावित संशोधन 2014 से ही अधर में लटका हुआ है। संशोधन करके यह प्रावधान किया जाना है कि गर्भपात कभी भी किया जा सकता है बशर्ते पैदा होने वाले बच्चे को कोई गंभीर दिक्कत होने की आशंका हो या मां की जान को खतरा हो। गंभीर दिक्कतों की एक सूची बनाने का प्रस्ताव भी है। अगर ये संशोधन पारित हो जाते हैं तो इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं रहेगी। क्योंकि तब गर्भपात किसी पंजीकृत स्वास्थ्यकर्मी की सलाह पर किया जा सकेगा।

प्रस्तावित संशोधन में पंजीकृत स्वास्थ्यकर्मी के दायरे में आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथिक के डाॅक्टरों और नर्स व अन्य ऐसी स्वास्थ्यकर्मियों को भी शामिल किया गया है। एलोपैथ के डॉक्टर इस प्रस्ताव का यह कह के विरोध कर रहे हैं कि ऐसा करने से कई तरह की मेडिकल गड़बड़ियां हो सकती हैं।

हालांकि, सरकार उन्हें गर्भपात करने का अधिकार जरूरी प्रशिक्षण और प्रमाणन के बाद ही देगी। कई अध्ययनों ने यह साबित किया है कि मध्य स्तर के स्वास्थ्यकर्मी ऐसे प्रशिक्षण के बाद सफलता से काम कर पाते हैं।

अगर ये प्रस्ताव पारित हो जाते हैं तो इससे गर्भपात और इससे संबंधित देखरेख की सुविधाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ जाएगी। लेकिन ये सुधार हवा में नहीं होने चाहिए। औसतन हर रोज 10 महिलाएं भारत में असुरक्षित गर्भपात की वजह से जान गंवाती हैं।

अनुमान है कि भारत में दो-तिहाई गर्भपात असुरक्षित तरीके से बगैर नियंत्रण वाले अनाधिकृत अस्पतालों में होते हैं। इसकी कई वजहें हैं। कहीं लोगों की पहुंच इसकी वजह है तो कहीं अधिकृत डाॅक्टरों द्वारा सेवा देने से इनकार। इसके अलावा इसकी सामाजिक वजहें भी हैं। साथ ही जागरूकता का अभाव भी एक बड़ी वजह है। इन दिक्कतों की वजह से महिलाएं असुरक्षित गर्भपात का विकल्प चुनने को मजबूर हैं।

गर्भपात में इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं जैसे मिफेप्रिस्टोन और मिसोप्रोस्टोल का इस्तेमाल बगैर किसी डाॅक्टरी सलाह की कर लेती हैं। भारत उन गिने-चुने देशों में है, जहां 46 साल पहले गर्भपात को कानूनी वैधता मिलने के बावजूद सुरक्षित गर्भपात की सुविधाओं तक लोगों की पहुंच नहीं हो पाई है। अगर इससे संबंधित कानून में संशोधन करके इसका विस्तार किया जाता है तो ऐसे प्रावधान भी किए जाने चाहिए जिससे सुरक्षित गर्भपात सुविधाओं तक लोगों की पहुंच स्थापित हो सके।

1971 में यह कानून जनसंख्या नियंत्रण और असुरक्षित गर्भपात की वजह से जान गंवा रही महिलाओं की बड़ी संख्या को देखते हुए लागू किया गया था। प्रस्तावित संशोधनों से उस वक्त उपेक्षित बिंदुओं जैसे महिलाओं की आजादी और निर्णय लेने के अधिकार की रक्षा की कोशिश की जा रही है।

संशोधनों के बाद 12 हफ्ते तक गर्भपात अपनी इच्छा के अनुसार कराया जा सकता है। गर्भवती महिला की समस्या और भ्रूण की समस्याओं को देखते हुए गर्भपात की जो 20 हफ्ते की सीमा थी, उसे बढ़ाकर 24 हफ्ते किया जाना है। एक और स्वागत योग्य बदलाव यह प्रस्तावित है कि अब गर्भनिरोधक के काम नहीं करने के आधार पर गर्भपात कराने के लिए वैवाहिक स्थिति की जानकारी देना अनिवार्य नहीं होगा।

1971 के बाद से अब तक सामाजिक और मेडिकल क्षेत्र में काफी बदलाव हुए हैं। इसलिए उस वक्त का कानून भी जड़ नहीं बना रह सकता।

ये संशोधन सही दिशा में सही कोशिश जरूर हैं लेकिन कई सवालों का समाधान इसके बाद भी करना होगा। कई महिलाओं को गर्भनिरोधक के इस्तेमाल की भी जानकारी नहीं है और कइयों को तो ये भी नहीं पता कि गर्भपात कराने का कानूनी अधिकार उनके पास है। इस दिशा में महिलाओं को जागरूक करने में स्वास्थ्यकर्मियों की अहम भूमिका है।

गर्भपात की सुविधा और गर्भनिरोधकों तक पहुंच जनस्वास्थ्य से जुड़े मसले हैं और इनका समाधान उसी स्तर पर होना चाहिए। महिलाओं को अपने अधिकारों के मामले में स्वतंत्र मानकर उन्हें अपने शरीर, सेक्सुअलिटी और प्रजनन आदि के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए।

प्रस्तावित संशोधनों वाले कानून को संसद के मौजूदा सत्र में संसद में पेश किया जाना है। अब समय आ गया है कि हमारे देश में कानून बनाने वाले और आम लोग गर्भपात पर खुलकर बेबाक बातचीत करें।

(इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली से साभार)


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