आस्था का आवरण
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आस्था का आवरण
अपने आस-पास और हर गली-मोहल्ले या सड़क पर लोगों को झुकते, हाथ जोड़ते, कान पकड़ते, तुनतुना बजाते और बुद-बुदाते खूब देखा है और देख भी रही हूं।
नई दिल्ली | अपने आस-पास और हर गली-मोहल्ले या सड़क पर लोगों को झुकते, हाथ जोड़ते, कान पकड़ते, तुनतुना बजाते और बुद-बुदाते खूब देखा है और देख भी रही हूं।
आगरा में एक सड़क के मोड़ पर बाटा का शो-रूम हुआ करता था। पिछली बारी जब घर गयी थी, तब उस मोड़ पर शनि महाराज बैठे दिखे। वहां भक्तों की लाइन नजर आई।

जहां रहती हूं, वहां का तो यह हाल है कि सुबह चार बजते ही घंटी की आवाज आने लगती है। एक पगड़ी लगाया हुआ, अजूबा सा दिखने वाला व्यक्ति जो खुद को मंदिर का पुजारी बताता है, वह माइक पर प्रवचन देता है। 

यहां तमाम औरतें कतार में खड़ी होकर जय-जय करती नजर आती हैं। फिर पुजारी के पांव छूकर ''सुन तू मेरी, मैं कहूं बहुतेरी'' करती हुई अपने-अपने घर की तरफ बढ़ जाती हैं।

जिस घर में रहती हूं, उस घर में शाम सात बजे से जय श्रीकृष्णा, महाभारत , रामायण , जय जय संतोषी मां आदि रात 12 बजे तक अपने दर्शन देने एक के बाद एक कर आते रहते हैं।

आंटी फुल वॉल्यूम में खुद तो तृप्त होती होंगी, पर मुझे पकाती हैं। अक्सर तो मुझे उनके डायलॉग सुन बहुत हंसी आती हैं। सबसे ज्यादा मज़ेदार होता है उनका बैक-ग्राउंड म्यूजिक बाप रे...। 

एक बार गलती से मैंने आंटी को छेड़ दिया कि वह क्यूं इतना धार्मिक है? उसके जवाब में आंटी ने मुझे घंटे भर से ज्यादा खड़ा रखा। भरी ठंडी में ये मेरा खुद पर किया गया सबसे दुखद अत्याचार रहा। इतना लंबा और ठंडा लेक्चर उन्होंने दिया, उसका इन शॉट ''जीवन का सार ईश्वर भक्ति में है, जो इससे दूर रहता है वह भटकता है'' मैंने सिर पिट लिया। काहे खुद को भटकाया, चुप से रजाई में नहीं बैठा जाता।

आगरा में एक सड़क के मोड़ पर बाटा का शो-रूम हुआ करता था। पिछली बारी जब घर गयी थी, तब उस मोड़ पर शनि महाराज बैठे दिखे। वहां भक्तों की लाइन नजर आई।

भाई बोले- शनि देव ने खूब जूते पहने। अब लोगों को पहनाने के लिए मंदिर बनवा लिया है।....हालाकि ये मजाक था, लेकिन लोग भी न जगह हथियाने के लिए क्या क्या हथकंडे अपनाते हैं। वो क्या पैदा करता होगा! ये चंद दिनों में भगवान पैदा कर लेते हैं।

इन सब से अलग, अब सबसे ज्यादा दुखी हूं मैं फेसबुक के मंदिरों से। ऐसे ऐसे पुजारी हैं यहां की क्या कहा जाए। कवर पर भगवान, प्रोफाइल पिक पर भगवान। दिनों रात आरती, थाली, भजन-कीर्तन चलते रहते हैं।

इतने भगवान हैं यहां कि गिनती कम पड़ जाए। ऐसे पुजारियों को अपने प्रोफाइल की सीढ़ियां चढ़ने से पहले ही उनको उलटे पांव भगा देती हूं।

मुझे रिक्वेस्ट वाले ये जान लें, मुझे इन सबसे चिढ़ है। भक्ति अच्छी बात है, पर अंधभक्ति से मुझे चिढ़ हैं। और आज कल जो नए भगवान बने हैं, उनको फॉलो करने वाले भी इस बात का ख्याल रखें कि मुझे मोदीयापा पसंद नहीं। न उसके नाम पर बकवास करने वाले।

मोदी के अंध भक्तों दूर ही रहो। और ये मेरी वॉल है, जो मन होगा वो लिखूंगी, जिसे दिक्कत हो वो यहां झांके भी नहीं।


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