बुधवार | दिसंबर १३, २०१७ तक के समाचार
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देश में हिंदू राष्ट्र का खतरा नहीं
जिन लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ और वैचारिक-रणनीतिक जकड़न के कारण भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की वास्तविक कोशिश नहीं की, वही आज शोर मचा रहे हैं कि संघ परिवार देश में हिंदू राष्ट्र-राज्य कायम करना चाहता है।
सुरक्षित गर्भपात का अधिकार
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेंसी कानून में लंबे समय से जिन संशोधनों की मांग की जा रही है, उन्हें करने का वक्त अब आ गया है।
बन्नी के मालधारी की कहानी
घुमंतू जातियां अंतर्मुखी होती हैं। स्वभाव से सरल और निर्मल। ठीक प्रकृति की तरह। इनमें भी मालधारी हों तो कहने ही क्या हैं!
बेहतर के चक्कर में गुड़ गोबर हो गया
अर्थशास्त्र की छात्रा ज्योत्स्ना की राय है कि मोदी सरकार ने बेहतर करने के चक्कर में गुड़ गोबर कर दिया है। यहां पढ़ें नोटबंदी पर उनकी राय।
निर्भया कांड के चार साल, कितना बदला समाज
निर्भया कांड के तुरंत बाद हमने मुख्य न्यायाधीश से मिलकर निवेदन किया कि सुप्रीम कोर्ट के 35 से अधिक फैसलों का केंद्र और राज्य सरकार द्वारा प्रभावी पालन नहीं होता जो राष्ट्रीय समस्या है।
अब तिजोरी भरने वाले परेशान हैं
दिल्ली के ऑटो चालक एक समय अरविंद केजरीवाल के कट्टर समर्थक थे। अब उन्होंने अपना मन बदल लिया है। नोटबंदी पर उनकी राय अलग है। यहां पढ़ें ऑटो चालक सुरेन्द्र यादव की राय
7 नवंबर 1966: जैसा मैंने देखा
राजधानी दिल्ली में 7 नवंबर, 1966 को क्या हुआ था? इस बाबत जितना लोग बताते हैं, उससे अधिक छुपा लेते हैं। मनमोहन शर्मा एक रिपोर्टर के तौर पर गो-भक्तों की उस रैली को कवर कर रहे थे। यहां पढ़ें कि उस दिन उन्होंने क्या देखा था।
क्यों छठ पर्व के गीत सुना रही बिहार की बेटी?
छठ पर्व के कई ऑडियो-वीडियो फेसबुक पर आए हैं। यूं कहें- कि इसका तांता लगा है। लेकिन, इनमें एक अनूठा है। बिहार की बेटी- नाम से फेसबुक वॉल पर वह ऑडियो टंगा है। कोई भी उसे सुन सकता है और लोक-परंपरा की गहराई का अनुमान लगा सकता है।
मेरी किताब में दहशतगर्द नहीं है
बात 2009 की है। हमने उस बच्चे से पूछा था कि दहशतगर्द के बारे में सुना है? जवाब में उसने कहा था- नहीं, मेरी किताब में नहीं है। तब वह बालक आठ साल का था। आज 15 का हो गया है। सुना है कि वह सवाल करने लगा है कि वादी में स्कूल बंद क्यों हैं? स्कूलों में आग क्यों लगाई जा रही है?
क्या गांव म्यूजिम में दिखेंगे
भारतीय दृष्टि से भारतीय संदर्भ को जानने-समझने की ललक बढ़ा दी है। पिछले दिनों इसका एक उदाहरण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिखा। भारत के गांवों को समझने-समझाने के क्रम में गुरुजी रविंद्र शर्मा ने कोई रोचक बातें बताईं।
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आंखों और चेहरे के लिए आसन
योग से आंखों की रोशनी और चेहरे की चमक भी बढ़ती है। सर्वांगासन आंखों और चेहरे के लिए काफी फायदेमंद है।
बनते किसान की छोटी सी कहानी
“आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान” रेणु ने जब यह लिखा था, तब पूर्णिया के किसान पटसन और धान की फसलों पर आश्रित थे। और खुश थे।
स्वस्थ शरीर का राज : एलोवेरा
एलोवेरा को पिछले 5000 सालों से औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है| रामायण और वेदों में भी इस पौधे की उपयोगिता की चर्चा की गई है| इसे औषधि की दुनिया में संजीवनी के रूप में भी जाना जाता है।
तलाक प्रक्रिया होगी सरल, पत्नी को संपत्ति में हिस्सा
सरकार विवाह से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव की तैयारी में है। एक कदम उठाते हुए केंद्रीय मंत्रीमंडल ने तलाक की प्रक्रिया को आसान बनाने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है।
कंप्यूटर का वरदान बन रहा है अभिशाप
हाथ और कलाई से संबंधित योगाभ्यास से उन लोगों को सबसे ज़्यादा लाभ होता है जो लिखने का काम या कंप्यूटर टाइपिंग आदि ज़्यादा करते हैं।
‘हिवरे बाजार’ एक गांव ऐसा भी
‘हिवरे बाजार’ यानी गांधी के सपनों का गांव। इक ऐसा गांव, जहां खुशहाल हिन्दुस्तान की आत्मा निवास करती है। बाजारवाद के अंधे युग में लौ का काम कर रही है।
ये छुआछूत क्या है, जो गहरे बैठा है
बॉलीवुड स्टर आमिर खान ने अपने कार्यक्रम में एक और सामाजिक मुद्दे छुआछूत को उठाया। वैस तो इस समस्या से सभी परिचित हैं, पर आमिर ने जिस तरह उठाया है, वह सराहनीय है।
एक आंदोलन ‘भूदान’ भी था
वह 18 अप्रैल, 1951 की तारीख थी, जब आचार्य विनोबा भावे को जमीन का पहला दान मिला था। उन्हें यह जमीन तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में दान में मिली थी।
क्या 1947 एक धोखा है और 1950 एक फरेब?
महज साठ बरस में अपने ही देश में नागरिक होना, कहलाना और बतौर नागरिक मौलिक अधिकार की मांग करना सबसे बड़ा गुनाह हो गया, यह किसने सोचा होगा।
सत्ता के गलियारों में खो गया सम्पूर्ण क्रांति का सपना
बदली परिस्थितियों में जयप्रकाश नारायण और भी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। आज समग्र क्रांति की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस होने लगी है। जिन मुद्दों पर जे.पी. आंदोलन खड़ा था, वे आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
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