मंगलवार | फ़रवरी २०, २०१८ तक के समाचार
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हमें तो हरी पत्ती चाहिए
गांव में हमारा खानदान तीन पट्टी का है। तीनों पट्टी का साझा एक बगीचा हुआ करता था- नौरंगवा। 1984-85 तक हम बच्चे उस बगीचे में अकेले जाने से बचते थे। वजह एक थी- नामालूम सा डर।
पाठकों से दूर नहीं रहना चाहता: पंकज दुबे
हमारी स्मृतियों में जो कैद होता है। समय के साथ वह अपना स्वरूप बदल लेता है। शायद इसलिए हम कभी अपनी स्मृतियों में कैद स्थानों पर नहीं लौट पाते। हमेशा आगे ही बढ़ते जाते हैं।
हर तस्वीर दीपिका से पूछ कर छापें?
माना जाए तो एक तरह से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने खुद को सही साबित करने की कोशिश की है।
खजाने में प्रचीन रोमन सिक्के भी हैं
पद्मनाभ स्वामी मंदिर का लेखा-जोखा पूर्व सीएजी विनोद राय की देख-रेख में हो रहा है। पेश है उनसे हुई बातचीत
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हमारी स्मृतियों में जो कैद होता है। समय के साथ वह अपना स्वरूप बदल लेता है। शायद इसलिए हम कभी अपनी स्मृतियों में कैद स्थानों पर नहीं लौट पाते। हमेशा आगे ही बढ़ते जाते हैं।
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पद्मनाभ स्वामी मंदिर का लेखा-जोखा पूर्व सीएजी विनोद राय की देख-रेख में हो रहा है। पेश है उनसे हुई बातचीत
हर तस्वीर दीपिका से पूछ कर छापें?
माना जाए तो एक तरह से टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने खुद को सही साबित करने की कोशिश की है।
हमें तो हरी पत्ती चाहिए
गांव में हमारा खानदान तीन पट्टी का है। तीनों पट्टी का साझा एक बगीचा हुआ करता था- नौरंगवा। 1984-85 तक हम बच्चे उस बगीचे में अकेले जाने से बचते थे। वजह एक थी- नामालूम सा डर।
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