रविवार | नवंबर १९, २०१७ तक के समाचार
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देश में हिंदू राष्ट्र का खतरा नहीं
जिन लोगों ने राजनीतिक स्वार्थ और वैचारिक-रणनीतिक जकड़न के कारण भाजपा को सत्ता में आने से रोकने की वास्तविक कोशिश नहीं की, वही आज शोर मचा रहे हैं कि संघ परिवार देश में हिंदू राष्ट्र-राज्य कायम करना चाहता है।
ऐ दिल्ली तू डराती क्यों है?
निर्भया कांड को चार साल बीत गए हैं। इसके बावजूद कुछ नहीं बदला है। कानून में कुछेक बदलाव हुए हैं, लेकिन उसका कोई असर नहीं दिखाई देता है। आखिर समाज इतना निष्ठुर क्यों है कि अकेली लड़कियां डर जाती हैं। यहां पढ़ें एक अनुभव
आपातकाल में फरारी के मेरे वे दिन
आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सीबीआई की विशेष टीम मेरी तलाश कर रही थी। पर, समय रहते पूर्व सूचना मिल गई और मैं किसी तरह उस टीम की गिरफ्त में आने से पहले फरार हो गया।
हमें तो हरी पत्ती चाहिए
गांव में हमारा खानदान तीन पट्टी का है। तीनों पट्टी का साझा एक बगीचा हुआ करता था- नौरंगवा। 1984-85 तक हम बच्चे उस बगीचे में अकेले जाने से बचते थे। वजह एक थी- नामालूम सा डर।
डरा हुआ पत्रकार मरा हुआ नागरिक बनाता है
छात्र जीवन जानने-समझने और सीखने के दौर से गुजरने का नाम है। यहां गलतियां होती हैं। लेकिन, दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में जो हुआ, उसे कोई किस रूप में ग्रहण करेगा? वह तो इंसाफ का परिसर है। इसलिए पत्रकार रवीश कुमार ने प्रधान न्यायाधीश के नाम जो खत लिखा है, उसे बार-बार पढ़ा जाना चाहिए।
अपने गुनाह का हिसाब दे जेएनयू
यह सच है कि बात कहने की आजादी प्रत्येक को है। यह सिर्फ जेएनयू के छात्रों की जागीर नहीं है। लेकिन, 29 अप्रैल, 2009 की घटना कुछ और कहानी कहती है। इससे जेएनयू परिसर का सच उजागर होता है।
मुसलमान और कुछ सवाल!
माल्दा एक सवाल है मुसलमानों के लिए! बेहद गम्भीर और बड़ा सवाल। सवाल के भीतर कई और सवालों के पेंच हैं, उलझे-गुलझे-अनसुलझे। और माल्दा अकेला सवाल नहीं है।
शुभ्रास्था का खत, केजरीवाल के नाम
दिल्ली की एक लड़की ने अरविंद केजरीवाल के नाम खुला पत्र लिखा है। पत्र में कहा है- मैं अपने नेता को निजामुद्दीन बस्ती और मेहरौली के स्लम का दौरा करते हुए देखना चाहती हूं। सुदूर घटना पर राजनीति करते हुए नहीं। यहां पढ़ें पूरा पत्र।
एक किताब जिसे आपने सराहा
दो साल हो गए मीडिया में मंडी किताब को आई। इस किताब का न लोकार्पण हुआ, न औपचारिक गोष्ठी। इसके बावजूद इसकी चर्चा खूब हुई। इस किताब से जुड़े कुछ संस्मरण सुना रहे है मीडिया में मंडी के लेखक विनीत कुमार।
माफीनामे का मोल क्या है?
बेशक दिल्ली चुनावी रंग में डूबी है। शोर इतना की पूछिए मत, लेकिन इससे अधिक डरा देने वाला शोर फिल्म "शाहिद" में हैं। पढ़ें प्रियंका की डायरी।
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सर्वाधिक लोकप्रिय
जातिवाद- एक अभिशाप
आज हिन्दू समाज में जातिवाद निस्संदेह रूप से एक अभिशाप की तरह है। 1400 सालों की सामाजिक संकरण और विकृति ने आज इसकी प्रासंगिकता को ही ख़त्म कर दिया है।
ग्रामसभा: गाँव की समस्याओं का समाधान
भारत की लगभग 70% आबादी गाँव में रहती है। आकड़ों के अनुसार देश की अधिकतर समस्या भी गाँव से जुडी हुई और इन समस्याओं का समाधान ग्रामपंचायत या ग्रामसभा के स्तर पर ही संभव है।
धनंजय चटर्जी जैसा हो धनंजय दंपत्ति का हश्र
करीब एक दशक पहले राष्ट्रीय परिदृश्य में एक नाम सहसा सुर्खियों में छा गया। नाम था धनंजय चटर्जी। मामला पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का था।
भारतीय राजनीति के दूसरे चंद्रशेखर- सुब्रमण्यम स्वामी
भारतीय राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के बाद सुब्रमण्यम स्वामी दूसरे ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जो बिना पार्टी के नेता कहे जा सकते हैं।
चुनाव के बहाने बनारस
चुनाव का परिणाम जो भी हो, बनारस के लोग फिलहाल चिंता की गठरी को गंगा में डुबोकर चुनाव का मजा ले रहे हैं।
इंसाफ और न्याय की आस में गांव समदपुर
सूबे में समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेष यादव भले ही ये कहते रहे कि गांवो का विकास उनकी प्राथमिकता है पर हकीकत की तस्वीर कुछ और ही है। इसकी झलक दिखती है मिर्जापुर जिले के एक गांव समदपुर में जहां का प्रधान खुद को प्रधानमंत्री से कम नहीं समझता।
जमीनी युवा नेतृत्व की जरुरत
वर्तमान समय में देश के राजनीतिक परिदृश्य को देखकर हम सहज ही अनुमान लगा सकते है कि भारत को जमीन से उठे हुए सशक्त युवाशक्ति के नेतृत्व कि सख्त जरुरत है।
नरेन्द्र मोदी:- उलझनों का देवता
नरेन्द्र मोदी को जो जिम्मेदारी दी गई है और जिस तरह दी गई है उस से संघ, भाजपा, कार्यकर्ता, आम वोटर, आडवानी यहाँ तक कि खुद नरेन्द्र मोदी भी उलझन में हैं. एक विश्लेषण:-
सहजीवन पर अदालती फैसला अनुकरणीय
सम्मानजनक जीवन यापन के लिए बने तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद महिलाएं कहीं न कहीं ऐसी विकट स्थिति का सामना करती रही हैं, जिसके कारण अदालत को उनके हित में संज्ञान लेना पड़ता है।
खाद्य सुरक्षा बिल: एक और घोटाले की तैयारी?
संसद में पेश खाद्य सुरक्षा बिल को पढ़ा। इस में इतनी खामियां मिली कि लगा जैसे ये बिल गरीबों को भरपेट अनाज देने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ वोट लेने के लिए लाया गया है।
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